क्या कुर्बानी का मतलब सिर्फ माल्यार्पण ही है ?

 

आज सम्पूर्ण भारत उन शहीदों को याद कर रहा है और उन्हें अपनी अपनी श्रधांजलि अर्पित कर रहा है, लेकिन क्या इन शहीदों की कुर्बानी को सिर्फ 23 मार्च को ही याद किया जा सकता मेरे हिसाब से तो नहीं !

क्योकि जिन शहीदों की वजह से आज हम खुद को स्वतंत्र और निर्भीक महसूस कर रहे है हम उनके लिए अपना सम्पूर्ण जीवन भी न्योछावर कर दे तो भी कम है वैसे भी आज सभी पार्टियां चौक-चौराहे पर शहीदों की प्रतिमा पर माल्यार्पण करेंगे और जनता के बीच लम्बी-चौड़ी भाषण दे कर फिर अगले 22 मार्च तक भूल जाएंगे और पुनः 23 मार्च को याद कर उन्हें माल्यार्पण करेंगे.
मेरे मन में बार-बार एक ही सवाल कौंध रहा है कि क्या कुर्बानी का मतलब सिर्फ माल्यार्पण ही है ? आखिर कब तक नेता इन शहीदों को साल में एक बार याद करते रहेंगे ? कब तक अपनी राजनितिक रोटीयाँ सेंकते रहेंगे ? और कब तक इन शहीदों के नाम पर नेता जनता से कोरे वादें करते रहेंगे ?
सच्चाई तो यह है कि हम उन शहीदों को एक दिन याद कर उनकी धुंधली परि गरिमा को नहीं चमका सकते ! हमें उनके लिए कुछ ऐसा करना या सोचना होगा कि देश का बच्चा बच्चा उन्हें याद रखे, इन शहीदों की जीवनी किताबो तक ही सीमित ना रहकर देश की जनता अपनी स्मृति में रखे जिस तरह से महात्मा गाँधी को बच्चा बच्चा जानता है उनकी तस्वीर को नोट पर छाप कर देश की स्मृति में बैठाया गया है उसी तरह इन शहीदों के सम्मान लिए भी हमें कुछ ऐसा ही करना चाहिए ताकि भारतियों को उन्हें याद करने की जरुरत ही ना पड़े. ऐसे वीर सपूतों को मेरा सत् सत् नमन केवल आज ही नहीं ताउम्र.....

राहुल तिवारी की कलम से 

 

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Rahul Tiwari

राहुल तिवारी 2 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं. वो इंडिया न्यूज़ में भी काम कर चुके हैं.

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