अध्ययन से अज्ञान का एहसास

आजीवन पग-पग पर ऐसे कुएं के मेंढक मिल जाएंगे जो यही मानकर बैठे हैं कि जितना वे जानते हैं ,उसी का नाम ज्ञान है इसके इधर-उधर और बाहर कुछ भी ज्ञान नहीं,उनसे ज्ञानी कोई नहीं परंतु सत्य तो यह है कि सागर की तरह ज्ञान की भी कोई सीमा नहीं। अपने ज्ञानी होने के अज्ञान में भ्रम को यदि तोड़ना हो तो अधिक से अधिक अध्ययन आवश्यक है जितना अधिक अध्ययन किया जाएगा, भ्रम टूटेगा और ऐसा आभास होगा कि अभी तो बहुत कुछ पढ़ना और जानना है।

शिक्षा के अनेक विषय व विभाग हैं किसी एक विषय में ही व्यक्ति संपूर्णता ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता अनंत विभागों व विषयों में पूर्ण होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। हां, इतना आवश्यक है की अधिकाधिक अध्ययन से मानसिक संतोष व आनंद की प्राप्ति अवश्य होगी।

अधिक अध्ययन से व्यक्ति की संकीर्णता समाप्त हो जाती है और दृष्टिकोण व्यापक हो जाता है।सतत अध्ययन एक और नई दिशाएं देता है तो दूसरी और पुरानी मान्यताओं को दूर करने व स्वस्थ मान्यताओं की स्थापना में सहायक सिद्ध होता है। हम घर बैठे किसी व्यक्ति, समाज या राष्ट्र की निंदा करते हैं,परंतु जब हम उसके विषय में अध्ययन करते हैं तो हमारा दृष्टिकोण व मान्यताएं बदल जाती हैं।

-रोहिणी झा

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