ऐसे कैसे यूँ ही हार जाएं हम!
कविता

ऐसे कैसे यूँ ही हार जाएं हम!

चंद्रशेखर, बिस्मिल, भगत सिंह को पढ़ते आएं हम
बताओ एक पल में ऐसे कैसे यूँ ही हार जाएं हम!
वक़्त के हालात से, सिस्टम की मार से
सत्ता की धमक से,नोटों की चमक से
तुम्ही बताओ ऐसे कैसे दब जाएं हम!

क्रांतिकारी युग और वक़्त देखकर पैदा नहीं लेते
क्रांतिकारी बनते हैं ज़ुल्म देखकर
लोगों का तिलता भविष्य देखकर

जिन्हें पढ़ते आएं बचपन से
जिनके पद चिन्हों पर चलने की ख्वाहिश है
फिर बताओ, क्यों ना उन्हें जी कर देखें हम!

ज़ुल्म के खिलाफ फिर क्यों ना
आवाज बन कर गूँजे हम!
अंगार बन कर फूटे हम!

- प्रफुल शांडिल्य

देश का द्वेष

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Praful Shandilya
praful shandilya is a journalist, columnist and founder of "The Nation First"
http://www.thenationfirst.com

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