विचार

अम्बेडकर ने तंग आ कर छोड़ा था हिन्दू धर्म तो गांधी ने दिया था एक 'यूनिक' नाम

भारत एक ऐसा देश है जहां लोग अपनी पहचान एक भारतीय के रूप में न करा कर पहले अपनी जाति से खुद की पहचान को दर्शाते हैं भले हीं वो डायरेक्ट रूप से सामने वाले कि जाति न पूछें लेकिन इनडाइरेक्ट रूप से सामने वाले कि जाति ज़रूर जानना चाहते हैं और अगर सामने वाला व्यक्ति दलित वर्ग का है और पूछने वाला कोई सामान्य वर्ग का है तो फिर सामान्य वर्ग का व्यक्ति उस दलित वर्ग के व्यक्ति के सामने खुद को ऐसे रिप्रजेंट करेगा मानो वो भगवान हो रहा हो और दलित व्यक्ति उसका दास और इस माहौल में जो इंसानियत का कत्ल होता है वो भी देखने लायक होता है ।

आखिर क्यों दलित और सामान्य वर्ग की ज़रूरत पड़ी जिससे इंसानियत का कत्ल होता है वहीं इतिहास ने तो इंसान को 4 भागों में बांटा था वो भी उनके कर्म के अधार पर,लेकिन आज इतने जाति उभर कर सामने आए हैं कि ठीक से काउंट भी नही किया जा सकता । और इन्हें बांटने में सबसे अहम योगदान रहा है राजनीतिक दलों का जिसने केवल इन्हें अपना वोटबैंक समझा और फॉरवर्ड और बैकवार्ड की राजनीति की चाहें वो गांधी हों या फिर अम्बेडकर या फिर आज की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी या कांग्रेस सबों ने जातिगत रोटी सेंका और अपनी ज़रूरत के हिसाब से इंसान को मोहरा बना कर जातिगत पासे फेंकता रहा और उनका वोट अपनी झोली में बटोरता रहा और इंसान आपस मे लड़ता रहा ।

एक तरफ तो गोवर्नमेंट कहती है इंसानो में भेद भाव करना कानूनन अपराध है लेकिन मुझे ये समझ नही आता कि ये कानूनन अपराध केवल आम आदमी के लिए ही क्यों है क्या इन कुर्सी के लोभी नेताओं के लिए इस तरह का कोई कानूनन प्रावधान नही है जिससे जातिगत राजनीति के लिए इन पे धारा चलाया जा सके ताकी ये इंसान को अपनी जरूरत के हिसाब से बाँटना बंद कर दें । क्या भारतीय संविधान में केवल आम आदमी के लिए ही कानून बनाया गया है इनके लिए किसी भी तरह का कानून का कोई प्रावधान नही है या फिर ये ये समझते हैं कि कानून इनके जेब मे है जब चाहा तब इस्तेमाल कर लिया ।

इस जाति की समस्या से ही अम्बेडकर ने पहले तो अंग्रेजों का साथ दिया था । फिर बाद में जातियता के खिलाफ आंदोलन करने के बाद जब उन्हें लगा कि इस देश का कुछ नही हो सकता तो थक-हार कर उन्होंने अपना धर्म परिवर्तन कर बौद्ध धर्म को अपना लिया और तमाम दलित वर्गों से अपील की कि अगर इस देश मे जीना है तो वो भी अपना धर्म परिवर्तन कर लें लेकिन इससे राजनितज्ञों का क्या ?

इंसान का धर्म परिवर्तन करने से उनका वोट थोड़े ही परिवर्तत हो जाता है अगर हो भी जाता है तो वो हर हथकंडा जानते हैं और बड़े आसीनी से फिर से उनकी वोट अपनी झोली में डाल सकते हैं और इनकी जातियता की दुकान बेधड़क चलती रहती है फर्क सिर्फ इतना पड़ता है कि वो किसी दूसरे जाति धर्म के नाम पर इंसान को बांटेगे, जैसा की गांधी जी ने किया था दलित को हरिजन कह कर ।

हरिजन पहले हरिजन के नाम से नही जाना जाता था इन्हें पिछड़ा वर्ग या दलित के रूप में जाना जाता था लेकिन शायद पिछड़ा वर्ग या दलित कहने में नेताओं को ज़्यादा समय लगता था और इसमे कोई यूनिकता भी नही थी तो इसलिए शायद लिए गांधी जी ने इन्हें एक यूनिक नाम दिया “हरिजन” ये नाम सुनने में भी मॉडर्न और डिजिटल लगता है और इसे बोलने मे भी ज़्यादा वक़्त नही लगता और उसके बाद से पिछड़े वर्ग को एक यूनिक और डिजिटल नाम से ही संबोधन किया जाने लगा और गांधी जी को इतने से भी मन नही भरा तो उन्होंने 1932 में हरिजन नामक पत्रिका का संपादन करना शुरु किया और साथ ही हरिजन सेवक संघ की भी स्थपना कर डाली अर्थात इंसान को बांटने में उन्होंने अपना योगदान देते हुए उस पर हरिजन नामक मोहर लगा दिया ।

कुल मिला कर ये कहा जा सकता है इंसान को बांटने वाला और कोई नही ये नेता ही हैं । गांधी ने इनडाइरेक्ट रूप से राजनीति की तो आज के नेता डायरेक्ट रूप से कर रहे हैं ऐसे में देश का विकास करना इम्पॉसिबल सा ही लगता है जब तक ऐसे इंसान को बांटने वाले दलाल रहेंगे । मेरी ऐसे दलालों से बस इतना ही अपील है कि आप कुर्सी पर बैठिये लेकिन इंसान को बांटने की राजनीति बंद कर देश को आगे बढ़ने में अपने कुर्सी का इस्तेमाल करें ताकि देश का भला हो सके।

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Rahul Tiwari
राहुल तिवारी 2 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं. वो इंडिया न्यूज़ में भी काम कर चुके हैं.
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