India's future on Red Light | बाल भिखारी
जुर्म देश

रेड लाईट पर भारत का भविष्य

भारत एक ऐसा देश है जहां भीक्षावृत्ति का गोरख धंधा सबसे ज्यादा चलाया जाता है और इस गोरख धंधे में सबसे ज्यादा पिसती है मासुम जिंदगीयां जिसका प्रमान  मंदिर, मस्जिद , रेड लाईट और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर देखने को मिलता है और चंद बाबू लोग चंद पैसे देकर जो प्राउड फिल करते है वो भी देखने योग्य होता है।

अधढ़का बदन और हाथो में कटोरा उनके जीवन का एक ऐसा बिम्ब खिंचता है मानों उनकी सारी सुख सुविधा और खुशियां उनके हाथों मे पड़े कटोरे के परिधी में ही समाहित हो चुकी है और उनकी मासुम आंखें हमेशा ऐसे राहगीर को टटोलती है जो उस कटोरे के परिधी मे चंद सिक्के डाल दे जिससे उनकी आंखे उस सिक्के की चमक से चमक उठे और जब ऐसा होता है तो मानो उनकी जिंदगी के कुछ छन वहीं ठहर जाती है और फिर उनकी मासुम आंखे दूसरे राहगीर को ढुंढने लगती है जो फिर से उनकी आंखों में एक चमक भर सके, लेकिन कब तक ?

यही सवाल हमेशा मेरे मन मे हमेशा कौंधता रहता है क्योंकि एक तरफ तो हम कहते है बच्चे ही देश के भविष्य होते है तो सवाल ये भी कि क्या ये बच्चे अपनी मर्जी से इस काम को अंजाम देते हैं या फिर किसी को हांथों देश के भविष्य को कुचने का प्रयास किया जाता है । सरकारी आंकड़ो की ओर नजर डालें तो ऐसे मासुम जिंदगीयों का कोई पुख्ता लेखा-जोखा सरकार के पास नहीं है ।

मंत्री सुश्री मीरा कुमारी कभी यही कहना है और साथ हीं उन्होंने यह भी कहा था कि ये समस्या हमारी नहीं बल्की राज्य सरकार की है और ऐसा भी नहीं है कि राज्य सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है । मुलायम सिंह के दौर में उत्तर प्रदेश मे भिखारीयों का सर्वेक्षण और पुनर्वास का फैसला लिया गया । दिल्ली सरकार ने भीख देने वालों के लिए जुर्माने का प्रवधान किया लेकिन सरकार को नीराशा हाथ लगी ।

child begging | India's future on Red Light

दिल्ली स्कूल ऑफ सोशल वर्क के मुताविक दिल्ली में लगभग 60 हजार भिखारी हैं और माया नगरी की बात करें तो “एक्शन ऐड” द्वारा किये गये अध्ययन के मुताबिक 3 लाख भिखारी हैं और कोलकत्ता में 75 हजार भिखारी हैं । अगर सरकार की भीक्षा मॉडल की बात करें तो वो ऐसे लोगों को सरकार भीखारी मानती है जिन्हे कम से कम 10 वर्ष भीक्षुगृह में डाला गया हो ।

अब सवाल उठता है कि उन मासुमो का क्या जिनकी उम्र भी 10 वर्ष नहीं होती । दुनिया में सबसे ज्यादा बाल भिखारी भारत में ही है और कई एनजीओ इस दलदल को समाप्त करने मे अपना योगदान दे रहे हैं इस एनजीओ के आंकडे पर नजर डालें तो 51 % ऐसे बच्चे हैं जो सातो दिन भीख मांगते हैं और 53 % यौन प्रताड़ना के शिकार होते हैं।

इस दलदल को पैदा करने वाले लोग भी आम लोग नही होते हैं कहीं न कहीं उनके सर पर नेताओं और पुंजिपतियों का हाथ होता है जिस कारण सरकार भी उन तक पहुंचने मे असफल रहती है ताजुब इस बात को जानकर होती है किहर साल 44 हजार बच्चों का किडनैपिंग होता है और मासुम जिंदगीयों से खेलने वाले अकेले नहीं हैं बल्कि कई ऐसे गिरोह होते हैं जो इन मासुम जिंदगीयों को इस दलदल मे ढकेलते है ।

बच्चों का इस्तेमाल देह व्यापार के लिए

10 साल से कम उम्र वाले लड़कियों को यौन उतेजना बढ़ाने वाली दवा का इस्तेमाल कर के वेश्यालय मे ढ़केल दिया जाता  है तो कुछ को अपंग कर के  रेड लाईट पर खड़ा कर दिया जाता है आय दिन पता चलता है कि किसी न किसी बच्चे का किडनैपिंग हो गय और अगर अगर बाल किडनैपिंग के आंकड़ों पर नजर डालें तो 1980 में 7 हजार नेपाली लडकियों को भारत मे देह व्यापार के लिए लाया गया था जिनकी उम्र महज 9-10 साल थी।

वहीं अगर UNICEF के आंकड़ों पर नजर डालें तो 12.6 मिलीयन बच्चे इस दलदल मे लिप्त हैं । 2009 के आंकड़ो पर नजर डालें तो 1.2 मिलियन बच्चों का इस्तेमाल देह व्यापार के लिए किया जाता है ।ये गोरख धंधा कब तक चलता रहेगा और अगर ऐसा हीं चलता रहा तो आने वाला समय देश के लिए काफि भ्यावह होगा और तब शायद लगाम लगाम असम्भव सा हो  जाएगा ।

 

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