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कविता

देश का द्वेष

हिन्दुस्तां में क्या यह नया है
मज़हबी रंग रगों में जो घुल सा गया है।
लकीरें सियासी जो खींची गईं हैं,
छुपाते हुए भी यह क्यों दिख रही हैं ?
हुआ ऐसा क्यों है, यह दोष है किसका ?
पीया हर किसी ने, क्यों प्याला यह विष का ?
सवाल जो जन्में, यूँ उनको दबाना,
सही क्यों है फतवों से सर-कलम करवाना ?
सर्वधर्म संभाव की युक्ति अपनी रही है,
फिर भीड़ का फैसला, क्यों सबसे सही है ?
विचारों में मतभेद तो होता रहेगा,
क्या भीतर का इंसां इसी में खोता रहेगा ?
अब द्वेष हमारा यह देश, ना ढो पायेगा,
बिन आँख मूंदे, भविष्य इसका अब सो जाएगा ।।

- राजीव शेखर
दानापुर, बिहार

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