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समाज के कुप्रथाओं पर तगड़ी चोट करती है फ़िल्म 'मगरूरियत

अरुनुज फ़िल्म्स के बैनर तले बनी फिल्म मगरूरियत  समय में समाज में फैली कुव्यवस्था के ऊपर फिल्माया गया है । फ़िल्म मगरूरियत में यह दिखानें की कोशिश की गई है कि कैसे आज से 40-50 साल पहले जमींदारी प्रथा समाज के गर्भ में अपना पैर फैला कर पिछड़ी जाति का शोषण करता था। यह फिल्म मूलतः जमींदारी प्रथा और अगड़ी जातियों के झूठी धौंस के ऊपर फिल्माया गया है ।

समाज में आज शायद इस तरह की कोई व्यवस्था नहीं है लेकिन आज से 40-50 साल पहले समाज मे शोषण व्यवस्था मौजूद थी.  जहां एक जमींदार अपने यहां काम कर रहे नौकर का शोषण करता है और उस पर अत्याचार करता है.  इस फ़िल्म में एक जमींदार है जिनके यहां नौकर उसके घर का सारा काम करता है जबकि उस नौकर को भली भांति यह पता होता है कि अब ठाकुर के पास कुछ नहीं बचा । झूठी शान को बनाये रखने के लिए शहर जा कर बची खुची जमीन भी बेच आता है . लेकिन उसकी झूठी शान फिर भी नहीं जाती।

फ़िल्म मगरूरियत एक ऐसा क्षण भी आता है जहां ठाकुर के यहां काम रहे छाबुआ की माँ की मौत हो जाती है । उस समय ठाकुर उसके घर आता है और उसको उसके घर से उसे घसीट कर ले जाता है । छाबुआ गिड़गिड़ाता रहता है लेकिन ठाकुर एक नहीं सुनता है । ऐसे ही इस फ़िल्म में और भी कई समाजिक कुव्यवस्था को दिखाया गया है । इस फ़िल्म में विधवा प्रथा और बाल विवाह पर भी चोट किया गया है ।

आपको को बता दें कि मगरूरियत एक शार्ट फ़िल्म है जिसमे चंद मिनटों में समाज के उस पहलू को छूने की कोशिश की गई है जो पहले समाज की दिशा और दशा बिगाड़ने में अहम भूमिका निभाता है. जमींदारी चले जाने के बाद भी उनका हम नहीं जाता है और समाज के एक वर्ग को जो पहले कमजोर होता था उसे अपना गुलाम बनाये रखने की हर संभव कोशिश करता है । इस फ़िल्म के डिरेक्टर अनुज कुमार रॉय है जिन्होंने इस फ़िल्म को अपनी पैनी नजर से तराशा है । फ़िल्म मगरूरियत को 30 अकटुबर को सारे डिजिटल प्लेटफार्म पर रिलीज किया जा रहा है ।

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Rahul Tiwari
युवा पत्रकार
http://www.thenationfirst.com

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