क्रूर बख्तियार खिलजी | Bakhtiyar Khalji
इतिहास के पन्नों से

क्रूर बख्तियार खिलजी की मौत लिखने वाले असम के हिन्दू राजा पृथु देव की अनकही कहानी

यह लेख भारतीय संस्कृति के लिए समर्पित दंडी सन्यासी पूज्य स्वामी जितेन्द्रानंद सरस्वती और टीम INII(Institute For Nurturing Indian intellect) के प्रेरणा से लिखी गई है

2007 में एक 12 वर्ष का विद्यार्थी अपने स्कूल टीम के साथ शैक्षिक भ्रमण पर निकलता है। उसके शैक्षिक भ्रमण में दो ऐतिहासिक जगह को शामिल किया गया था । पहला ऐतिहासिक स्थल था नालन्दा और दूसरा राजगीर,ये दोनों ऐतिहासिक और प्राचीन भारत से नाता रखने वाले जगह बिहार में स्थित हैं ।

उस 12 वर्ष के विद्यार्थी को न तो अपने संस्कृति का ज्ञान था और न ही अपने जड़ का बोध। नालन्दा पहुंचकर वह देखता है की जैसे एक विशाल खंडहर उससे कुछ बाते करना चाह रहा हो। विद्यार्थी ने अपने किताब में नालन्दा के बारे में पढ़ा था कि वहां पर पुराने समय में एक बड़ा सा विश्वविद्यालय हुआ करता था फिर उस विधार्थी ने अपने सहपाठी से पूछा कि आखिर किसने ढाहा था इसको?
उसका सहपाठी जो सामान्य ज्ञान का जानकार था उसने झट से जवाब दिया-बख्तियार खिलजी ने 1200 ईसवीं में ढाहा था इस विश्वविद्यालय को।

विद्यार्थी ने फिर पूछा-क्यों ढाहा था? ये भी तो हमलोगों के विद्यालय जैसा ही होगा! दूसरे विधार्थी ने चुपी साध ली। फिर कुछ देर बाद बोला,नही पता यार,वो मुस्लिम थें इसीलिए शायद।

वह विद्यार्थी जब 20 वर्ष का हुआ तो उसे ज्ञात हुआ की कोई बख्तियारपुर नामक रेलवे स्टेशन भी है उस खूनी,क्रूर और बर्बर बख्तियार खिलजी के नाम पर। ये तो ठीक उसी तरह है जैसे यहूदियों का देश इजराइल के किसी शहर का नाम हिटलरपुर रख दिया जाए या जापान के किसी शहर का नाम अमेरिका रख दिया जाए लेकिन अफसोस हम न तो इस्राएल हैं और न ही जापान,की हमें अपने इतिहास का गहरा बोध हो।

आगे पता चलता है की बख्तियार खिलजी ने नालन्दा विश्वविद्यालय के साथ विक्रमशिला विश्वविद्यालय और ओदंतपुरी महाविहार को भी ढाहा था। तिब्बती रिकॉर्ड कलाचक्र के अनुसार ओदंतपुरी महाविहार में अकेले उस समय 12,000 विधार्थी पढ़ते थें।

तिब्बत के इतिहासकार तारानाथ ने इस जगह को नालन्दा के बाद दूसरा सबसे बड़ा शिक्षा का महाविहार बताया था। नालन्दा की बात करें तो 5वीं शताब्दी में कुमारगुप्त ने इसकी नींव रखी थी जिसे कन्नौज(वर्तमान उत्तरप्रदेश में) के राजा हर्षवर्धन ने अपनी ताकत और धन झोंककर इसकी पहचान पूरे दुनिया में स्थापित की।

यहां पर चीन,कोरिया,जापान, तिब्बत,इंडोनेशिया,तुर्की से आकर लोगों ने शिक्षा ग्रहण की।चीन के यात्री ह्वेनसांग ने गुरु शीलभद्र से योग और अन्य विषयों की शिक्षा प्राप्त की।ह्वेनसांग चीन वापस जाते समय 657 पुस्तक और 150 बौद्धिक और भारतीय अवशेषों को 520 सन्दूक में 12 घोड़ों पर लादकर ले गया।

ह्वेनसांग ने लिखा है की 8 बड़े हॉल और 300 अपार्टमेंट के साथ विश्वविद्यालय में एक बड़ा कई मंज़िला पुस्तकालय था, जिसका नाम "धर्मगंज" था।बाद में बख्तियार खिलजी ने हमला करने के बाद उस पुस्तकालय में आग लगा दिया था,बिहार में प्रचलित दंतकथा के अनुसार वह पुस्तकालय महीने तक जलता रहा था।ताजा अध्ययन में एक और बड़े पुस्तकालय की पुष्टि विक्रमशिला विश्वविद्यालय में भी हुई है जिसे बख्तियार खिलजी ने ही जलाया था।

अब विद्यार्थी जब 24 वर्ष का हुआ तो उसे इस बात में दिलचस्पी हुई की इतने शिक्षा के स्थान को ढाहने वाले बख्तियार खिलजी की मौत कैसे हुई थी,तो बहुत खोजबीन के बाद उसे आखिर कहानी मिल गयी ।आइये चलते हैं उस कहानी पर।

बख्तियार खिलजी खलज कबिला में पैदा हुआ था,जगह था आज का अफ़ग़ानिस्तान।मुहम्मद गौरी के वारिस क़ुतुब्दीन ऐबक ने उसे मिर्जापुर(वर्तमान उत्तर प्रदेश में) सम्भालने की जिम्मेवारी सौंपी। मिर्ज़ापुर का बिहार और बंगाल के काफी करीब होने के कारण बख्तियार खिलजी की नज़र बिहार और बंगाल पर हमेशा बनी रहती थी। उसने धीरे-धीरे अपने मुहिम को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया।

उस वक़्त बंगाल और बिहार में कोई शक्तिशाली राजा न होने के कारण वह बिहार के नालन्दा विश्वविद्यालय,विक्रमशिला विश्वविधालय और ओदंतपुरी को ढाहने में सफल रहा। हज़ारों विद्वान ब्राह्मणों और बौद्ध भिक्षुओं की हत्या करते हुए,छोटे राजाओं को हराते हुए वह बंगाल के देवकोट पहुंच गया।बंगलादेश के कवि अल-महमूद ने बाद में उसकी प्रशंसा में "बख्तियार के घोड़े" नामक कविता लिखी जिसमें उसने बताया की बख्तियार ने हजारों लोगों को इस्लाम में धर्मांतरण करवाया और बंगाल में इस्लाम की गहरी नींव रखी।

कुछ वर्ष बाद बख्तियार खिलजी तिब्बत पर हमला करने के लिए अपने सहयोगी अली मर्दन को बारीसाल बंगाल की जिम्मेवारी सौंप कर आगे बढ़ा। उसके साथ कुल 12 हज़ार घोड़े थें और अपनी पिछली सफल हमलों के कारण वह साहस से भरा हुआ था।वह अपनी सेना के साथ बर्द्धकोट की ओर बढ़ा,बागमती नदी पार कर उसे असम होते हुए तिब्बत की तरफ बढ़ना था।बागमती के उसपार असम के राजा पृथु देव(1185-1228 ईस्वी) का साम्राज्य शुरू होता था।

बागमती उस समय गंगा से तीन गुनी चौड़ी और गहरी बताई जाती थी।उत्तर-पूर्व भारत की मौजूदा नदियों को देखकर यह बात कहीं से भी अतिशयोक्ति नही लगती है।बख्तियार अपने 12 हज़ार सेना के साथ उस नदी को पार करने में असक्षम था इसीलिए वह नदी के किनारे-किनारे अपनी सेना का साथ 10 दिन तक रुक-रुककर चलता रहा की कोई स्थान जहाँ छिछला पानी हो या पत्थर के ब्रिज मिले तो वह पार कर सके।

10 दिन चलने के बाद वह एक पत्थर के ब्रिज के पास पहुंचा जहाँ से नदी पार कर वह कामरूप में प्रवेश किया। उस समय तीस्ता-सारतोया कामरूप की पच्क्षिमी सीमा हुआ करती थी। ऐसा कहा जाता है की अपने सिमा से गुजरते हुए बख्तियार खिलजी को देखकर कामरूप के राजा पृथु देव ने उसे सूचना भेजा की एक वर्ष के बाद तुम तैयारी से आओ तो मैं भी तुम्हारे साथ तिब्बत की ओर बढूंगा। बख्तियार खिलजी राजा पृथु की बात को अनसुना करते हुए कामरूप के समतल मैदान की तरफ बढ़ा। कामरूप उस समय शानदार खेती और किलेबन्दी के लिए विख्यात था।

बख्तियार अपने घमंड में चूर होकर आगे बढ़ता रहा और पूरे दमखम के साथ किले पर हमला किया।किले के अंदर की सेना पहले से सतर्क थी,उन्होंने मोर्चा संभाला और इसी बीच कामरूप के आमलोगों को पता चल गया की किले पर बाहरी हमलावर ने हमला किया है,हज़ारों की संख्या में आमलोगों ने हथियार उठाकर किले का रुख किया और खिलजी की सेना को पीछे से मारने लगें।

वहाँ से 15 मिल दूर किलेबंद शहर करमपतन को इस हमले का जब पता चला तो वो लोग भी अपनी सेना को लेकर राजा पृथु की सेना की मदद करने आगे बढ़े,करमपतन मुख्यरूप से ब्राह्मणों और नूनीस का शहर था। जब दूसरी तरफ से भी हमले की सूचना बख्तियार को मिली तो वो अपनी "सेना के परिषद" के साथ मन्त्रणा कर पीछे हटने लगा लेकिन पीछे हटना और घातक साबित हुआ,क्योंकि पृथु के सेना ने तबतक उसके सप्लाई लाइन को काटकर उसके पीछे लौटने के सभी रास्तों को जाम कर दिया था।

अब राजा पृथु ने सामने से उसके घोड्सवारों पर घातक और असरदार हमला किया, जिसके फलस्वरूप बहुत बड़ी संख्या में उसकी सेना मारी गई।बहुत कठिनाई के साथ घायल अवस्था में बचे-खुचे सेना के साथ वह नदी किनारे पहुंचा पर नदी पर बनी वह पत्थर की ब्रिज को टूटा हुआ पाया, जहाँ से नदी पार करना बेहद खतरनाक था।भटकते हुए उसकी बची हुई छोटी सी टुकड़ी एक बड़ी सी मंदिर में पहुंची और शरण ले ली,उसके अनुसार मंदिर में सोने की बड़ी-बड़ी मूर्तियां थी।

तब तक राजा पृथु पीछा करते हुए अपनी सेना के साथ वहाँ आ धमके। उनकी सेना ने आम लोगों की सहायता से बांस के बाधक के सहारे उस मंदिर को घेरने लगी क्योंकि साथ में तेज़-तर्रार घोड़ा होने के कारण बख्तियार की अभी भी भाग निकलने की संभावना बनी हुई थी।

बाँस का घेराव देखकर बख्तियार सब समझ गया और वहाँ से निकलकर अपनी छोटी टुकड़ी के साथ नदी के ओर भागने लगा,राजा पृथु ने उनका पीछा किया।बख्तियार अपनी सेना की छोटी टुकड़ी के साथ नदी में कूद पड़ा।नदी की तेज धारा उसके कई सैनिकों को बहाकर ले गई,वहीं बख्तियार खिलजी घायल अवस्था में कुछ सैनिकों के साथ दूसरे छोर पर पहुँचा।

एक बेहद ही शर्मनाक और निराशाजनक हार मिलने के बाद वह वहाँ से देवकोट लौटा और घायल होने के कारण कुछ समय तक बीमार रहा,बंगाल के शासन की ताक में नज़र लगाए बैठे उसके सहयोगी अली-मर्दन ने बीमार अवस्था मे ही उसकी हत्या कर दी और बख्तियार खिलजी अकाल मृत्यु की मुंह में समा गया।

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Rajan Bhardwaj
Traveller,Deep interest in social-political-economical aspect of indian society, use to keep eye on international relationship. Spiritual by heart and soul.
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