इतिहास के पन्नों से राजनीति

नहीं रहे दिल्ली में बीजेपी की जड़ें जमानें वाले मदनलाल खुराना!

भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार का एक जाना पहचाना चेहरा आज सदा के लिए संसार को अलविदा कह गया. हम बात कर रहे हैं दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे मदनलाल खुराना की. 82 वर्षीय खुराना,  27 अक्टूबर की रात 11:00 बजे सदा के लिए इस दुनिया से रूखसत हो गये. इस बात की जानकारी उनके बेटे हरीश खुराना ने ट्विटर पर दी. वह पिछले काफी समय से ब्रेन स्ट्रोक की वजह से कोमा में थे.  डॉक्टर लगातार उनका इलाज कर रहे थे लेकिन राजनीति का माहिर खिलाड़ी जिंदगी की जंग हार गए.

15 अक्टूबर 1936 को उस समय के लालपुर (पंजाब) , जो अब फैसलाबाद पाकिस्तान में है, श्री खुराना का जन्म हुआ था.  जब  वह 12 साल के थे तो उन्हें निर्वासित जीवन जीने के लिए कीर्ति नगर दिल्ली रिफ्यूजी कॉलोनी आना पड़ा. यहां उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के किरोड़ीमल कॉलेज से ग्रेजुएशन किया. खुराना की एंट्री पॉलिटिक्स में तब हुई जब वह इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहे थे.

1959 में वे इलाहाबाद स्टूडेंट यूनियन के जनरल सेक्रेट्री चुने गए और फिर 1960 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के जनरल सेक्रेट्री बने. खुराना, विजय कुमार मल्होत्रा के साथ पीजीडीएवी कॉलेज में पढ़ाया करते थे. लेकिन राजनीति का प्रेम उन्हें इसकी तरफ खींच लाया. मदन लाल खुराना,  विजय कुमार मल्होत्रा, केदारनाथ साहनी और कंवर लाल गुप्ता वे नाम थे जिन्होंने जनसंघ की दिल्ली शाखा खोला, जो 1980 में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गया.

खुराना 1965 से 1967 तक जनसंघ के जनरल सेक्रेट्री रहे. शुरू से हीं आरएसएस के विचारधारा को फॉलो करनें वाले खुराना नें पहले  दिल्ली नगर निगम में पॉलिटिक्स में अपना नाम कमाया. उसके बाद विधानसभा में विपक्ष के नेता भी बने. जब भारतीय जनता पार्टी 1984 के चुनाव में बुरी तरह हारी, मदन लाल खुराना नें हीं पार्टी को दिल्ली में संभाल लिया.  बिना थके पार्टी के लिए लगातार काम करनें के कारण उन्हें टाइटल मिला 'दिल्ली का शेर' 'द लायन ऑफ़ दिल्ली'. वह 1993 में दिल्ली के तीसरे मुख्यमंत्री बने और फिर 1996 में उन्होंने इस्तीफा भी दे दिया. जब पार्टी में साहिब सिंह वर्मा के सपोर्ट में ज्यादा विधायक खड़े थे, मदन लाल खुराना नें बिना दिक्कत पद से इस्तीफा देना उचित समझा.

जब केंद्र में वाजपेयी सरकार बनी तो मदन लाल खुराना को संसदीय कार्य और पर्यटन मंत्रालय सौंपा गया. लेकिन यहां भी उन्होंने इस्तीफा दे दिया. इसका कारण था कि उस समय ईसाईयों पर अटैक किए गए थे जिसके लिए हिंदू ग्रुप को बदनाम किया गया. जिससे खफा होकर उन्होंने सरकार से इस्तीफा दे दिया. 14 जनवरी 2004 को उन्होंने राजस्थान में गवर्नर का पद संभाला.  जब उनके राज्यपाल बने कुछ महीनें हीं हुए थें, दिल्ली से लगभग आधा दर्जन एमएलए जयपुर राजभवन पहुंचे.उन्होंने मदन लाल खुराना से दोबारा सक्रिय राजनीति में लौटने का आग्रह किया. खुराना मान गए और 28 अक्टूबर 2004 को उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया.

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20 अगस्त 2005 को भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी की आलोचना और उनके नेतृत्व में काम करने में असमर्थता दिखानें के कारण उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया.  हालांकि 1 महीने के अंदर 12 सितंबर को वापस उन्हें पार्टी में शामिल किया गया. तब उन्होंने माफी मांगी ली थी. लेकिन फिर 19 मार्च 2006 को उन्हें बीजेपी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया गया.  क्योंकि उन्होंने भाजपा से निलंबित नेता उमा भारती की रैली में शामिल होने का ऐलान किया था.

खुराना बीजेपी से अलग तो हो गए लेकिन जिस पार्टी के लिए उन्होनें अपना जीवन समर्पित कर दिया, उससे इतनी आसानी से दूर कैसे रह सकते थे. बीजेपी में उनकी वापसी तो हो गई लेकिन इसके बाद उन्होंने राजनीति को सदा के लिए अलविदा कह दिया. कुछ साल पहले आए ब्रेन स्टोक के बाद से वह कोमा में थे और आखिरकार उन्होनें दुनिया छोड़ दी.

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Ankush M Thakur
Alrounder, A pure Indian, Young Journalist, Sports lover, Sports and political commentator
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