कैसे हुई भारत में सम्प्रदायवाद की शुरुआत, क्या है इसका इतिहास ? सम्प्रदाय
इतिहास के पन्नों से

कैसे हुई भारत में सम्प्रदायवाद की शुरुआत, क्या है इसका इतिहास ?

“सम्प्रदाय” ये शब्द पढ़ने और सुनने में जितना  सामान्य सा लगता है इसके परिणाम उतने ही भयावह हैं और भारत जैसे देश मे तो इसकी महत्ता अपने चरम पर होती है लेकिन एक वक्त था जब भारत में यह शब्द था ही नही या यूं कहें कि इस शब्द की ज़रूरत ही नही थी । इसका कारण था भारत मे हिन्दू-मुस्लिमों की एकता जो मिसाल के लायक थी लेकिन वो कहते हैं ना कि जब वक़्त बुरा आता है तो सारी मिसालें धुंधली पड़ जाती हैं ।

19वीं शताब्दी में जन्मी या आई शब्द “सम्प्रदाय” भी कुछ ऐसी ही कारनामें करने में सफल रही और इतिहास को साम्प्रदयिक रंग चढाने की शुरूआत की, जिसकी रंगत आज तक नहीं उतरी है । एक ब्रिटिश इतिहासकार ‘जेम्स’ ने इस शब्द को हवा देते हुए भारतीय इतिहास के प्राचीन काल को हिंदूवादी युग, तो मध्यकाल को मुस्लिमो का युग कह कर दो एक दिल पर कड़ा प्रहार किया, लेकिन शायद वो ये बोलना भूल गया कि मध्ययुग मुस्लिमो के नाम ही नही अपितु ईसाइयों के नाम भी रहे थे ।

उसने ये तो बता दिया कि उस समय मुस्लिम शासक थे और हिन्दू शासित अर्थात् ये वो वक़्त था जब भारत की पहचान शासक और शासित के धर्म के अनुसार बताया गया और साथ ही इस बात पर भी मोहर लगा दिया गया कि हिन्दू-मुस्लिम संस्कृतियां अलग अलग मौजूद थीं । यह एक ऐसा तथ्य था जो अंग्रेजों के शासन के पहले भारत मे कहीं नही था ।

लेकिन वक़्त के साथ इतिहास धुंधला पड़ने लगा और अब वो वक़्त भी आ गया जब लोगों ने आजादी के नारे को बुलंद किया और हज़ार वर्ष की गुलामी और विदेशी शासक जैसे नारे जनमन की आवाज बनने लगी । 19वीं सदी में जन्मा सम्प्रदाय शब्द की भारत की आजादी में अहम भूमिका थी क्योंकि इसी शब्द के सहारे भारत का इतिहास गढ़ा जा रहा था और फिर धीरे-धीरे  मुस्लिम जो अपनी कट्टरता का परिचायक बनने लगा, तो वही हिन्दू भी अपनी कट्टरता का बिगुल अलग फूंकने लगे जिसके परिणाम स्वरुप कई ऐसी संस्थानों की स्थपना होने लगी जो खुद को हिन्दू मुस्लिम के पोषक बता कर सम्प्रदायीकता को उस बुलंदी पर पहुंचा दिया जहां से वापस लाना असंभव सा प्रतीत होने लगा ।

जैसा कि दिनकर जी ने कहा था, "साम्प्रदयिकता एक संक्रमण रोग की तरह है जो धीरे-धीरे भारतीयों के दिलों में अपना स्थान सुरक्षित कर रहा है" ।  वहीं अंग्रेजों ने भी इस शब्द का पुरजोर फायदा उठाया चूंकि 1857 की क्रांति में मुस्लिमो की भागीदारी अधिक थी इस लिए अंग्रेजो ने उनकी संस्कृति से संबंध रखने वाले हर एक चीज को नष्ट करने का आदेश दिया और विद्रोह करने वाले मुस्लिमों को दंडित किया, जिस पर नेहरू ने कहा था, “विद्रोह में हिंदुओं से ज़्यादा मुस्लिमों के खून बहे हैं जिस पर अंग्रेजों ने कहा कि विद्रोह के विरुद्ध शासन द्वारा की गई कार्यवाहियों के बाद पूरा मुस्लिम वर्ग अपनी अवहेलना का अनुभव कर रहा है ।“ अर्थात यहां   भारतीय नेताओं के द्वारा भी सम्प्रदायिक रंग को चढाने मे कोई कसर नही छोरा गया और इन्हें बांटने की रणनीति जारी रही ।.

लेकिन कुछ पल बीतने के बाद 1860 के दशक में कुछ ऐसे व्यक्ति आये जिनका मनना था कि हम केवल हिंदुस्तानी हैं और ऐसे व्यक्तियों के लिस्ट में पहला नाम ‘सर सैयद अहमद खां’ का आता है  जिनका मानना था कि वो केवल भारतीय हैं और वो सम्प्रदाय को नही मानते । सर सैयद खां ने हिन्दू मुस्लिम एकता पर जोर देते हुए एक संस्था खोली जो दोनों की हित की बात करती थी । सर सैयद के आने के बाद लगने लगा था कि अब सम्प्रदाय शब्द शायद खत्म हो जायेगा, लेकिन कहा जाता है कि जख्म ठीक हो सकते हैं नासूर नहीं और वही नासूर बनी कांग्रेस, जिसके गठन के बाद सैयद के सूर बदल गए और  उसके बाद कि घटनाओं से उन्हें लगने लगा की मुस्लिमो को आर्थिक अवसर और सरकार की सहभागिता सरकार का साथ दे कर ही बढ़ाया जा सकता है और अंततः हिन्दू मुस्लिम एकता को एक बार फिर जोरदार झटका लगा और सैयद द्वारा साम्प्रदयिक विचारधारा को फैलाया जाने लगा ।

सर सैयद के सूर बदल गये वो कहने लगे कि जिस दिन अंग्रेज भारत से चले जायेंगे बहुसंख्यक हिन्दू, मुस्लिमों को मिटा देंगे । अतः हमें अंग्रेजो के प्रति वफादार रहना होगा क्योंकि कांग्रेस एक हिंदूवादी संस्था है । अब उनकी मांगे केवल मुस्लिम हित पर आधारित होने लगीं । उनकी मांग थी विधानमंडलों में हिन्दू मुस्लिमो की भागीदारी बराबर हो, लेकिन कांग्रेस ने इस बात को एक सिरे से खारिज कर दिया  और इस तरह हिन्दू मुस्लिम एकता की बात करने वाला आदमी एक कट्टर मुस्लिम बन गया और संप्रदाय शब्द फिर बुलंद हो गई ।

लेकिन फिर कांग्रेस ने एक पहल करते हुए 1887 में बदरुद्दीन तैय्यबजी को कांग्रेस का अध्यक्ष बना कर खुद को हिन्दू-मुस्लिम की पार्टी घोषित करने की कोशिश की लेकिन फिर भी कांग्रेस हिन्दू-मुस्लिम की एकता को बनाये रखने में असफल रही ।और इस पर अंतिम वार करने के लिए 1907 में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई ।

अब मुस्लिमों का भी नजरिया पूरी तरह हिन्दू विरोधी हो गया लेकिन जिस तरह हर क्रिया की एक प्रतिक्रिया होती है ठीक उसी सिद्धान्त पर मुस्लिम साम्प्रदयिकता के विरुद्ध में हिन्दू साम्प्रदयिकता  ने जन्म लिया जिसके वाहक के रूप में हिन्दू महासभा, आर्यसमाज  सामने आई । मुस्लिम लीग और हिंदूवादी संस्था ने मिल कर सम्प्रदाय शब्द को पोषणा पालना शुरू किया और इसमें पानी देने का काम 1909 में आई पंजाब हिंदूसभा ने किया । इसके  संस्थापक बी एन मुखर्जी ने ये कहा की हिंदुओं को ये समझ लेना चाहिए कि वो हिन्दू पहले और भारतीय बाद में हैं । ठीक इसी तरह के का बयान सैयद अहमद खां द्वारा दिया गया था और ऐसे ऐसे बयानों से सम्प्रदाय शब्द और मजबूत होती चली गयी ।

लेकिन एक बार फिर एक ऐसा वक़्त आया जब लगने लगा इस सम्प्रदाय नामक राक्षस का अंत अब निश्चित है क्योंकि रौलट एक्ट के विरोध में खिलाफत और असहयोग आंदोलन के दौरान भारत में राष्ट्रवादी विचारधारा मजबूत हुई और हिन्दू मुस्लिम एकता के नारे लगने लगे । इस एकता को मजबूत करने के लिए आर्य समाजी स्वामी श्रद्धानंद को दिल्ली की जामा मस्जिद के मंच से भाषण करने के लिए बुलाया गया और डॉक्टर सैफ़ुद्दीन किचलू को अमृतसर के स्वर्णमंदिर की चाभियाँ सौंप कर हिन्दू मुस्लिम एकता की नई इबादत लिखी गई ।

असहयोग आंदोलन वापस लेने से हिन्दू-मुस्लिम एकता को लगा धक्का  

लेकिन इस एकता को धक्का 1922 के असहयोग आंदोलन वापस ले लेने के रूप में लगा और साम्प्रदायिक दंगे शुरु हो गये जो मुस्लिम अभी तक आंदोलन में शामिल हो कर एकता के मिसाल दे रहे थे उन्होंने ही गांधी और कांग्रेस का विरोध करना शुरू कर दिया और अपने भाषणों में जहर उगल कर हिन्दू मुस्लिम की एकता को सदा के लिए खत्म करने में जुट गए तो वहीं लीग को फिर से ऑक्सीजन मिल गई और सांप्रदायिक पौधा को खाद पानी मिलने लगा । वो फिर से एक बार हरा-भरा हो गया ।

इसी बीच 1923 में हिन्दू सभा का भी पुनर्जन्म हुआ और इस बार इसे किसी की सहयोग की ज़रूरत नही थी । इस संस्था ने रेस में सब को पीछे छोड़ दिया जिस कारण इसमें लाल लाजपतराय, मदन मोहन मालवीय जैसे धुरंधर नेता शामिल हो कर इस एकता को एक और नया आयाम देने को तैयारी मे लग गये तो वही 1927 में साइमन कमीशन का सार्वजनिक रूप से अस्वीकृत होने में भी संप्रदीयकता की झलक साफ दिखने लगी और फिर जिन्ना जैसे जिन्न ने नेहरू रिपोर्ट के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की । अब तक मुस्लिमों के साथ-साथ हिंदुओं के अंदर भी साम्प्रदायिकता घर कर चुकी थी ।

इस घर को खड़ा 1941 में पूरी तरह कर दिया गया जब करांची में एक सभा का नारा बना अगर हिन्दू कायदे  से नही मानते हैं तो उन्हें  उसी तरह खत्म करना होगा जैसे कि जर्मनी में यहूदियों को खत्म किया गया था और ये बयान हिन्दू मुस्लिम एकता को ख़त्म करने के लिए अंतिम प्रहार था जिसके परिणामस्वरूप हिंदुओं की भी जोरदार प्रतिक्रिया आने लगी जिसकी कमान बी डी सावरकर ने संभाल रखी थी ।

इस घर में बालू और सिमेंट लगाने का काम स्वयंसेवक संघ ने किया और अब इस बात का प्रचार होने लगा कि मुसलमान हिन्दुओ को उनके ही घर मे कैद कर गुलाम बनाना चाहते और 1939 में संघ के संचालक एम एस गोलवलकर ने अपनी पुस्तिका “वी” से  घर को पाटना शुरू किया और अन्तत: हिन्दू मुस्लिम सदा के लिए एक दूसरे के कट्टर विरोधी बन गए और पुरानी एकता सदा के लिए समाप्त हो गई जिसका भविष्य में भी एक होने के असर कम ही दिख रहा हैं । जिस तरह हिन्दू-मुस्लिम मंदिर मस्जिद के लिए आपस मे लड़ रहे हैं वैसे मे इस एकता को एक कैसे किया जा सकता है !

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