'कोहिनूर' को पाने के लिए रंजीत सिंह ने इस शासक को उसी के किले में कर लिया था कैद
इतिहास के पन्नों से

'कोहिनूर' को पाने के लिए रंजीत सिंह ने इस शासक को उसी के किले में कर लिया था कैद

इतिहास के पन्नो में अपना खास स्थान रखने वाला इस कोहिनूर हीरे को हर कोई अपने मुकुट या फिर अपने दरबार में रख कर उसकी खूबसूरती को बढ़ाना चाहता था और ऐसा मौका रंजीत सिंह के पास चल कर खुद आया था । अब तक तो उन्होंने केवल इस हीरे का नाम सुना था लेकिन वो वक़्त भी दूर नहीं था जब उसकी चमक को अपनी आंखों से निहारते । बात उस समय की है जब शाहसुजा को 1812 में महमूद शाह ने पराजित कर अतामोहम्मद को सौंप दिया था और अतामोहम्मद ने उसे शेरगढ़ के किले में कैद कर रखा था ।

उस समय शाहसुजा की बेगम वफ़ा बेगम खुद अफगानिस्तान की महारानी थी जो किसी भी कीमत पर अपने पति शाहसुजा को वहां से आजाद करवाना चाहतीं थी । कहा जाता है 18 के दशक में मात्र दो ही ऐसे लोग थे जिनके पास उस समय की सबसे बेहतरीन सेना थी । पहली ईस्ट इंडिया कंपनी और दूसरे रंजीत सिंह इस लिए वफ़ा बेगम ने रंजीत सिंह से मुलाकात कर कहा कि अगर वो शेरगढ़ के किले से उसके पति को आजाद करा दें तो वो उन्हें कोहिनूर हीरा सौंप देगी । उस समय रंजीत सिंह खूद कश्मीर को अतामोहम्मद की गुलामी से आजाद कराना चाहते थे इस लिए वो तुरंत राजी हो गए ।

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कोहिनूर देने से मुकर गयी बेगम

अब रंजीत सिंह ने इस हीरे को प्राप्त करने के लिए कश्मीर पर आक्रमण करने का प्रण लिया और अपनी सेना के साथ निकल पड़े और कश्मीर को आजाद कर लिया । रंजीत सिंह के दीवान मोहकचंद ने शेरगढ़ के किले को घेर कर वहाँ से शाहसुजा को आजाद करा लिया और उसे वफ़ा बेगम को सौंप दिया । लेकिन अब वफ़ा बेगम अपने वादे से मुकरने लगी कई महीने बीतने के बाद जब रंजीत सिंह ने शाहसुजा से कोहिनूर हीरे के बारे में पूछा तो वो और उसकी बेगम बहाने बनाने लगे और जब रंजीत सिंह ने दबाव बनाना शुरू किया तो शाहसुजा ने उन्हें नकली हीरा दे दिया जो जोहरी के परख में नकली साबित हुआ ।

इसके बाद रंजीत सिंह आगबबूला हो कर मुबारक हवेली को घेर लिया और दो दिनों तक महल में खाना बंद करवा दिया । लेकिन उन्हें तुरंत पता चल गया की शाहसुजा ने हीरे को अपने पगड़ी में छुपा रखा है उसके बाद उन्होंने शाहसुजा को काबुल की गद्दी दिलाने का वादा किया और उसके पगड़ी को बदल कर कोहिनूर हीरे पर कब्जा कर लिया । रंजीत सिंह काफी दानी स्वभाव का व्यक्ति था वो इस हीरे को जगन्नाथपुरी के मंदिर में स्थापित करना चाहता था लेकिन उनके कोषाध्यक्ष बेलीराम की कूटनीति के कारण अधूरा ही रह गया । रंजीत सिंह के मृत्यु के बाद यह हीरा अंग्रेजों के हाथ लग जिसे उन्होंने इंग्लैण्ड की महारानी विक्टोरिया को खुश करने के लिए उसे सौंप दिया और विक्टोरिया ने कोहिनूर हीरे को अपने मुकुट में जरवा दिया था ।

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