इतिहास के पन्नों से

देश के कुछ दिग्गज नेता ही अंग्रेजी हुकूमत के प्रति नही थे एक मत

भारतीय राजनीति में नेता कभी भी एक मत नही रह पाते हैं समय और परिस्थिति के अनुसार वो रंग बदलने में गिरगिट को भी पीछे छोड़ देते हैं बस उन्हें इंतज़ार होता है तो सही मौके का जिसका वो जम कर फायदा उठा सकें |

हम बात करने वाले हैं इतिहास के सबसे बड़े और सम्मानित नेताओ के बारे में जो कइयों के लिए आदर्श और पूजनीय थे. तो आइये  सबसे बात करते है गोपाल कृष्ण गोखले के बारे में. जी हाँ गोखले उस समय राजनीति के सबसे बड़े धुरंधर माने जाते थे जिसने  26 मार्च 1902 के पहले बजट भाषण में अंग्रेजों की धज्जियां उड़ाई  और भारत की गिरती दसा को दुनिया के आर्थिक इतिहास में सर्वाधिक दुखद घटना बताया और कहा की इसका जिम्मेदार  केवल अंग्रेज हैं गोखले की राजनीतिक सूझबूझ के कारण महात्मा गांधी ने इन्हें अपना राजनीतिक गुरु मना था.

लेकिन एक समय ऐसा भी था जब गोखले अंग्रेजों को भारत के लिए हितकारी मानते थे और अंग्रेजों के प्रति अपनी आस्था जताते हुए कहा था कि आज देश मे केवल अंग्रेज ही शासन व्यवस्था बनाये रखने में सफल हैं । मुझे ये समझ नही आता कि यह किस तरह की व्यवस्था थी जहां देश का धन देश से बाहर ले जाया जाता था देश का किसान कर्ज के तले दबा हुआ था और देश का धन अंग्रेजी सैनिकों के ऊपर खर्च किया जा रहा था ।

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वहीं अगर देश के एक और धुरंधर नेता लाला लाजपत राय की बात करें तो शुरु में वो भी कांग्रेस और अंग्रेजों के विरोधी थे और इसका विरोध करते हुए उन्होंने कहा था कांग्रेस अंग्रेजों की पार्टी है और इसका निर्माण अंग्रेजों ने अपने हित के लिए किया है साथ ही उन्होंने ये भी कहा था कि कांग्रेस की स्थपना का उद्देश्य देश को बचाना नही बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य को आने वाले ख़तरों से सुरक्षित करना है ।

जब ह्यूम ने कांग्रेस की निव रखी थी तब  लाला लाजपत राय ने इसका विरोध डब्ल्यू सी बनर्जी के मत का समर्थन कर किया था डब्ल्यू सी बनर्जी ने कहा था कि कांग्रेस ह्यूम और डफरिन के शैतानी दिमाग की उपज है यहां तो लाला लाजपत राय ने अंग्रेज विरोधी तेवर दिखाया लेकिन एक समय आया कि वो ह्यूम के गुणगान करते हुए कांग्रेस के पहले अधिवेसन में कहा कि ह्यूम भारत के लिए सदैव चिंतित रहते थे और उनका ह्रदय भारत की निर्धनता और दुर्दशा पर रोता था ह्यूम वास्तविक रूप से काफी उदारवादी थे और इन्होंने भारत की सेवा लगभग 20 वर्षों तक किया था।

अब यहां ये साफ नही हो पाता है कि एक ही व्यक्ति के लिए दो मत कैसे रखा जा सकता है जो भारत के लिए अहितकारी था वो हितकारी कैसे हो सकता है मेरा मानना है किसी भी व्यक्ति के लिए मत एक होना चाहिए चाहें वो कोई भी परिस्थिति हो ।

 

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