अगर प्लासी का युद्ध सिराजुद्दौला जीत गया होता तो भारत का इतिहास कुछ और होता
इतिहास के पन्नों से

अगर प्लासी का युद्ध सिराजुद्दौला जीत गया होता तो भारत का इतिहास कुछ और होता

कहा जाता है कि अगर प्लासी का युद्ध सिराजुद्दौला जीत गया होता तो यहीं से अंग्रेज वापस चले गये होते इसके साथ ही भारत में उनके विस्तार के रास्ते भी बंद हो जाते और हिन्दुस्तान का इतिहास बदल गया होता लेकिन सिराजूद्दौला का युद्ध जीतना मुश्किल था क्योंकि नवाब (सिराजुद्दौला) उस समय अपने ही घर के दुश्मनों से घिरे हुए थे जो उनको मारने के लिए निरंतर षड्यंत्र रच रहे थे. अपनों की गद्दारी ने ही नवाब को हार का मुख दिखा दिया यानी कि 1757 के प्लासी का युद्ध ही वो कारण था जिसने भारत को पूर्ण रुप से अंग्रेजो के अधीन कर दिया और मीर जाफर ने उसके सारे रास्ते खोल दिए ।

बंगाल उस समय पुरे भारत का व्यापारिक केंद्र बना हुआ था जिसे अंग्रेज किसी भी कीमत पर अपने अधीन कर लेना चाहते थे । सिराजुद्दौला अपने दादा अली वर्दि खां की जगह गद्दी पर बैठा था जो युवा और काफी उग्र स्वभाव का माना जाता था । जिस गद्दी पर वो बैठा था उस गद्दी का दावेदार मीर जाफर भी था जो राय दूर्लभ और यार लतीफ खां के साथ मिल कर उसे गद्दी से हटाना चाहता था लेकिन मीर जाफर ये बखूबी जानता था कि ऐसा कर पाना उसके लिए सम्भव नहीं था इस लिए वो अंग्रेजों से जा मिला ।

mir jafar
                     मीर जाफर

इधर जोश-जुनुन से लबालब सिराजुद्दौला गद्दी पर बैठते हीं कासिम बजार पर हमला कर अंग्रेजों की फैक्टरी पर कब्जा कर लिया और उसके बाद 20 जुन 1756 को कलकत्ता के फोर्ट विलियम पर भी अपना अधिकार कर लिया लेकिन वहां से भागते अंग्रजो पर उसने कोई ध्यान नहीं दिया । इतिहासकारों के अनुसार उस समय बंगाल सबसे संपन्न प्रांत था जो अंग्रेजों के लिए किस्मत की लकीर साबित होने वाला था ।

और वो दिन बहुत जल्द ही आ गया जब अंग्रेजों ने मीर जाफर की सहायता से दूगुनी ताकत के साथ युद्ध लड़े . अर्थात 1757 में क्लाईव ने पून: कलकत्ता को अपने कब्जे में कर लिया और नवाब को वहां से भागना परा लेकिन अंग्रेजों का पेट इतने से कहां भरने वाला था । वो सिराजुद्दौला को उसके गद्दी से हटाकर किसी ऐसे को बैठाना चाहते थे जो उनके अधिन में रहे और बंगाल को खुलकर लुटने दे ।

अपने मनसुबों को सफल बनाने के लिए उन्होंने मीर जाफर को गद्दी पर बैठाने का फैसला किया क्योंकि मीर जाफर ही वो आस्तिन का सांप था जिसके सहारे अंग्रेज लुट खसोट आसानी से कर सकते थे । अपने मनसुबों को सफल करने के लिए नवाब के सामने अंग्रेजों ने ऐसी मांगें रखी जिसे पूरा करना सम्भव नहीं था क्योंकि सिराजुद्दौला उग्र स्वभाव के होने के साथ साथ काफी स्वाभिमानी भी था .

आधी सेना थी मीर जाफर के अधीन 

अपनी मांगों को ठुकरा दिये जाने के बाद वो युद्ध की तैयारी में लग गये और इधर नवाब भी युद्ध की तैयारी करने लगे और 23 जुन 1757 को नवाब पहले से ही एक षड्यंत्र के तहत प्लासी के मैदान में अपनी सेना के साथ खड़े थे । नवाब के पास करीब 4500 सेना थी लेकिन आधे से अधिक सेना उनके दुश्मन मीर जाफर, यार लतीफ खां और राय दर्लभ के अधिन थी यानी कि सिराजुद्दौला की हार किसी भी हालत में टाली नहीं जा सकती थी क्योंकि आधे से ज्यादा सैनिक वहां मुकदर्शक के रुप मे खड़ी रहने वाली थी ।

23 जुन को युद्ध शुरू हुई जिसमें नवाब के सेना के एक टुकड़ी का नेतृत्व उनके दो विश्वासी मीर मादन और मोहन लाल कर रहा थे । दोनों युद्ध करते हुए मारे गये और नवाब को वहां से भागना पड़ा लेकिन वो रास्ते में ही मीर जाफर के बेटे मीरन के हाथों मारे गये । प्लासी का युद्ध केवल नाम का युद्ध था क्योंकि इस युद्ध मे अंग्रेजों के केवल 29 सैनिक और नवाब के 500 से अधिक सैनिक मारे गये । इस युद्ध के बाद मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाया गया जिसके बाद अंग्रेजों ने दुगनी ताकत क साथ बंगाल को लुटा और साथ ही इस युद्ध के बाद अंग्रेजो के लिए सारे रास्ते खुल गए जिसके बाद उनका अधिकार धीरे- धीरे लगभग पूरे भारत पर हो गया ।

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