इतिहास के पन्नों से

प्राणसुख यादव: एक महान योद्धा जिसे हम भुल गए

यादव कूल ने हमेशा से भारत की भूमि की रक्षा की है । इनके शौर्य,अनुशासन,और कर्तव्य निर्वहन की अद्वितीय क्षमता ने हमारे समाज को हमेशा ही जगाए रखा है । इसी कूल में जन्म हुआ एक ऐसे विलक्षण प्रतिभा का जिनमें साहस और अपनी मिट्टी से प्यार कुट कुटकर भरा हुआ था। 6 फुट के ऊँचाई के इस महान सेनापति का नाम प्राणसुख यादव था । ये महान राजा रंजीत सिंह के सेनापति थें तथा मुख्य सेनापति और उस समय के प्रख्यात योद्धा हरिसिंह नलवा के सबसे करीबी दोस्त थें।

1819 में हरिसिंह नलवा ने प्राणसुख यादव को काश्मीर आक्रमण के समय एक टुकड़ी का जिम्मा सौंपा जब यादव मात्र 17 वर्ष के थें । उस समय काश्मीर पर अफगानिस्तान के दुर्रानी वंश का शासन हुआ करता था तथा पिछले 500 वर्ष से काश्मीर मुस्लिम शासन के अधीन था । सिक्ख आर्मी ने इस निर्णायक युद्ध को जीत लिया जिसमें 17 वर्ष का नौजवान प्राणसुख की तलवारबाजी और घुड़सवारी के साथ वीरता का किस्सा सुना गया और उसकी कद महाराणा रंजीत सिंह और हरिसिंह नलवा के नजर में अचानक से बढ गई । काश्मीर पर सिक्खों का कब्जा हो गया।

मंगल(काश्मीर 1821) के युद्ध में मात्र 7000 की रंजीत सिंह की फौज ने विपक्ष के 25000 फौज को हराया और इस युद्ध में प्राणसुख यादव और हरिसिंह नलवा के वीरता और पराक्रम पर मुहर ही लग गई । ऐसा कहा जाता है की प्राणसुख यादव ने अकेले विपक्ष के 100 सैनिक का सिर,धङ से अलग कर दिया।

अपना सबसे करीबी दोस्त हरिसिंह नलवा को खो देने के बाद भी प्रथम और द्वितीय एंग्लो-सिक्ख युद्ध में यादव लड़ते रहें और ब्रिटिश के प्रबल शत्रु के रूप में उभरें।वह खुद दोनों युद्ध में जिंदा बच निकलें ।

1857 की क्रांति में राव तुलाराम के साथ वो नसीबपुर के अहरवाल युद्ध में पुरे जोशो खरोश के साथ ब्रिटिश आर्मी के खिलाफ लङे।उसी समय एरीपुरा रेजिमेंट में बगावत की खबर पाकर प्राणसुख यादव ने जोधपुर लेजियन के कमांडर से संपर्क किया तथा तय किया की नारनौल में ब्रिटिश सेना से लड़ने का यही सही समय है।

नारनौल में उन्होने एक लाल टोपी पहने कर्नल पर निशाना साधा जिसके बाकि के सैनिक खाकी वर्दी में थें पहली बार निशान चुक गया लेकिन दुसरी बार की फायरिंग में गोली कर्नल गेरार्ड के सिर पर लगा और गेरार्ड मारा गया,बाकि के करीब 100 सैनिक की टुकङी भी यादव के निशाने पर रही और कई ब्रिटिश सैनिक मारे गएं।अपना काम खत्म करने के बाद वह वहां से निकल गएं और छुप छुपकर अलवर,हरियाणा और पश्चिमी यूपी के किसानों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग देते रहें।

बाद में ब्रिटिश आर्मी उनको काफी खोजती रही लेकिन वो मिलने से रहें। अपने अज्ञातवास के दौरान उनकी मुलाकात स्वामी दयानंद सरस्वती से हुई जिसके बाद वो आर्य समाज के हिन्दू धार्मिक सुधार कार्य से जुङकर अपनी गुमनाम जिंदगी बिताते रहें।आखिरी सांस तक ब्रिटिश के खिलाफ गाँव-गाँव में घुमकर बगावत की आग तेज करने वाला ये शख्स 1888 में खुद को आजाद रखते हुए ही इस भारत की पुण्यभूमि को छोड़कर चल निकला।

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