इतिहास के पन्नों से

हिन्दुस्तान का बॉर्डर पार करने के लिए जब सुभाष चन्द्र बोस को बनना पड़ा मुसलमान

जब भारत अंग्रेजी हुकूमत का गुलाम था, उस समय कई ऐसे क्रांतिकारी थे जो अपने-अपने तरीकों से भारत को आजादी दिलाने की कोशिश में लगे थे। उन्ही स्वतंत्रता सेनानियों में महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस का नाम भी शुमार है । लेकिन अगर इन दोनों नेताओं के आपसी संबंधों की बात करें तो शुरुआत में तो ठीक था परंतु कुछ ही दिनों बाद दोनों का अंग्रेजों से लड़ने का अंदाज भिन्न हो गया ।

एक ओर जहां महात्मा गांधी अहिंसा नीति पर भरोसा करते थे तो दूसरी ओर सुभाष चंद्र बोस की सोंच ठीक इसके विपरीत थी जिसका गांधी हमेशा ही विरोध करते थे और इसी विरोध के कारण सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे कर 1939 में फॉरवर्ड ब्लाक  की स्थापना की और इसके बाद वो देश को स्वतंत्र कराने की लड़ाई अपने तरीके से लड़ना शुरु किया और इसी बीच उन्हें कई परेशानीयों का सामना भी करना पड़ा था ।

सुभाष चंद्र बोस इस लड़ाई को देश से बाहर ले जाना चाहते थे लेकिन जब उन्होंने देखा कि वो गांधी जी और कांग्रेस को अपने तत्कालीन विचारधारा से जोड़ने में असफल हो रहे हैं तब उन्होंने सबसे पहले अपने परिवार के लोगों को विश्वास में लिया ताकि देश से बाहर जाने का रास्ता साफ हो सके । आपको बता दें को उन दिनों सुभाष चन्द्र बोस को अंग्रेजों ने जेल से रिहा करने के बाद घर मे नजर बंद कर दिया था जिस कारण वहां से बाहर निकलना मुश्किल था ।

इस काम के लिए उन्होंने अपने परिवार के  लोगों से सहायता ली जिससे वो घर से बाहर भी आ सके और गोपनीयता भी बनी रहे । इस काम के लिये उन्होंने अपनी भतीजी इला, भतीजे शिशिर ,अरविंद और दिविजेन तथा बड़े भाई शरत बोस की मदद ली ।

अब नेता जी घर से बाहर निकलने में सफल रहे और उसके बाद उन्होंने कांग्रेस से असंतुष्ट और फारवर्ड के कार्यकर्ताओं की एक मीटिंग कोलकाता में रखी । जब फारवर्ड ब्लाक वर्किंग कमेटी की बैठक में सरीक होने के बहाने पश्चिमोत्तर प्रान्त के सदस्य एवम बोस के मित्र मियाँ अकबार शाह कोलकाता आये तो शिशिर बोस ने सुभाष चन्द्र बोस के लिए सरहदी मुसलमानों द्वारा पहने जाने वाला कपड़ा खरीद कर लाये और उसके बाद सुभाष चन्द्र बोस का एक नकली विजिटिंग कार्ड छपवाया गया जिसमे उनका नाम  मोहम्मद जियाउद्दीन था और उन्हें ट्रैवलिंग इंस्पेक्टर-द इम्पायर ऑफ इंडिया लाइफ इंश्योरेंस कंपनी का पद भी दिया गया और उस विजिटिंग कार्ड में उनका पता था सिविल लाइन्स,जबलपुर ,मध्य प्रदेश ।

इतना कुछ सुभाष चंद्र बोस को अपने देश से बाहर जाने के लिए करना पड़ा तब जाकर भारत की आजादी की लड़ाई को उन्होंने विदेशों में जाकर लड़ा । सलाम है ऐसे जज़्बे को जिसके बदौलत आज हम स्वतंत्र है.

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