जरा हटके

मच्छरों ने किया जीना मुहाल

जी हाँ! एकदम सही पढ़ रहे हैं आप। आइये,आज आपको कहानी सुनाते हैं एक ऐसे गाँव की;गाँव के निवासियों की,जहाँ के लोग रात में मच्छरों के कारण सो नहीं पाते हैं। आपके मन में प्रश्न उठ रहा होगा कि मैं कैसे जानता हूँ?गाँव का नाम क्या है?क्यों इतने मच्छर हैं,जिसके कारण लोग सो नहीं पाते हैं,आदि-आदि। तो थोड़ा धैर्य रखिये ज़नाब! मैं आपको आज सबकुछ बताऊँगा।आप बस मेरे साथ सफ़र में आगे बढ़ते चलिए।

हाँ तो अब मूल बात पे आता हूँ। क्या है कि साहित्य का विद्यार्थी हूँ न! तो जबतक सारी बातें खोल-खोलकर स्पष्ट न कर दूँ और रसानुभूति न करा दूँ तबतक समझना थोड़ा मुश्किल होगा। आसानी से सबकुछ समझ में आ जाये, आपके हृदय में आनंद छा जाये और मेरा उद्देश्य भी पूरा हो जाये,इसलिए भूमिका बांध रहा हूँ;साथ में विश्लेषण भी करता चल रहा हूँ;यात्रा के लिए निकल तो रहा हूँ,पर अपनी बुद्धि और हृदय को साथ लिए चल रहा हूँ।

आप भी ऐसा करें तो बेहतर!न करें तो आप जानें,आपका काम जानें,मैं आपको अच्छा रास्ता बता सकता हूँ,उसपर चलने के लिए विवश नहीं कर सकता हूँ,क्योंकि मैं प्रेम का पक्षधर हूँ।इसलिए प्रेम से माने तो ठीक,न माने तो फिर आप जानें क्या होगा?क्योंकि समय सबका इतिहास लिखेगा।

पटना से 25 किलोमीटर की दूरी पर,पटना जिला अन्तर्गत,पुनपुन नदी के किनारे,फतुहा,नारायणा से सटे'खोखुना'(जगदीशपुर)नामक एक गाँव है।मैं वहीं की बात कर रहा हूँ और वहीं के लोगों की कहानी सुना रहा हूँ।मैं इतने नजदीक से इसलिए जानता हूँ कि मैं वहीँ पला-बढ़ा हूँ और अभी मौजूद हूँ।

यह गाँव कहने के लिए पटना से काफ़ी नजदीक है,पर ऐसा लगता है जैसे पटना से यह काफी दूर है। क्योंकि यहाँ विकास न के बराबर है।दरअसल,यह भूमिहारों का गांव है और इसके आस-पास का इलाका यादव-बहुल है।इसलिए यहाँ के विधायक भी ज्यादातर यादव समुदाय के लोग ही बनते हैं।चूँकि उनकी जनसँख्या ज्यादा है।और यह तो हम बिहार में बराबर देखते हैं जिसकी ज्यादा जनसँख्या उसी की सरकार,चाहे उसमें सोलह दूनी आठ पढ़ने वाले ही क्यों न हों।

आखिर हमारा लोकतंत्र, हमारा संविधान बहुमत की सरकार मानता है,बिना यह देखे कि जो बहुमत की सरकार है वह सरकार बनने योग्य है या नहीं।ठीक ही कहा है किसी विद्वान ने,''लोकतंत्र मूर्खों की सरकार है।''बचपन में पढ़ा था,नौवीं कक्षा में,उस समय लगता था क्या यह बात सही है?अथवा,लिखने वाले से कहीं भूल-चूक हो गयी?

पर आज लगता है,बात बिलकुल सही है और कोई भूल-चूक नहीं हुई है और आज इसका उदाहरण हर जगह देखा जा सकता है।आज यह देखा जा सकता है कि चाहे मुखिया हो,प्रमुख हो,विधायक हो,मंत्री हो या फिर जो हो,99 प्रतिशत मुर्ख हैं।विद्वान लोग चुप हैं,क्योंकि वे अल्पसंख्यक हैं। वो तो शुक्र है,वर्षों बाद कोई योग्य और ईमानदार प्रधानमंत्री बन पाएं हैं।जो अकेले ही देश को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।यद्यपि साथ देनेवालों में बहुतों का नाम गिनाया जा सकता है,तथापि सच क्या है,यह सभी जानते हैं।

हाँ तो चूँकि मेरा गाँव 'भूमिहारों'का गाँव है,इसलिए इस पर किसी भी विधायक या मंत्री का ध्यान नहीं है।यदि यादवों का गाँव रहता,तो आज मेरा भी गाँव आधुनिक सुविधाओं से लैश होता।लोग कहते हैं और किताबों में भी पढ़ा है,जातिवाद बहुत बुरी चीज़ है;इससे हरेक व्यक्ति को बचना चाहिए और कम-से-कम शिक्षित व्यक्ति को तो इससे ऊपर रहना चाहिए।पर आज उल्टा है,आज शिक्षित व्यक्ति ही सबसे ज्यादा जातिवाद करते नजर आते हैं।

और जातिवाद का जहर सबसे ज्यादा तथाकथित नेता फैलाते दीखते हैं।आज अपने नाम के पीछे 'यादव'लिखना गर्व की बात कुछ मुर्ख लोग समझने लगे हैं।मैं कहता हूँ,तुम इंसान हो ,यह काफी नहीं है क्या?इंसान हो तो इंसान बनकर रहो और हो सके तो अच्छे काम करो,जातिवाद के चक्कर में पड़कर क्यूँ अपना बुरा इतिहास लिख रहे हो।कुछ ऐसा काम करो कि लोग तुम्हें जाति से नहीं,बल्कि तुम्हारे सुकर्म के कारण याद रखें।

मेरा गाँव उपेक्षित पड़ा हुआ है।यह हमारे महान मुखिया जी;नेता जी की देन है।आजकल नेता जी को फुर्सत ही नहीं रहती है कि वे मेरे गाँव की ओर भी ताकें।आखिर अख़बारों में अपना नाम;अपने कई सद्कार्यों के बारे में छपवाना भी रहता है।बेचारे इसी में थक जाते हैं। मीडिया वाले भी क्या करें? इनके कार्यों से;इनके गुणगान गाने से उन्हें फुर्सत मिले तब न वे मेरे गाँव पर ध्यान दें।वे कह भी सकते हैं,आपके गांव जैसा हजारो गाँव है,हम किस-किस पर ध्यान दें।और हमारा पेट नेताओं के गुण गाने से भरता है।

हम लोगों की समस्यायों पे ध्यान देने लगे तो भूखे मरने की नौबत आ जायेगी।आप भी कमाल करते हैं,आपको तो कोई काम है नहीं,थोडा-बहुत लिखना जान गए हैं,तो तेज बन रहे हैं।कुछ दिन हमलोगों के साथ रह के देखिये,फिर आटे-दाल का भाव पता चलेगा।आखिर आप हमलोगों की समस्या समझते ही नहीं।ऐसी ही बातें नेतागण;सम्बंधित पदाधिकारीगण भी कह सकते हैं।सबकी अपनी-अपनी समस्याएं हैं भाई!किसी को भी अपने काम से फुर्सत नहीं है।हर किसी को बस खुद से मतलब है।आज लोकहित;परोपकार;मानवता;परदुःखकातरता आदि भावनाओं का लोप हो चूका है।

आज किताब की बातें किताबों तक ही सिमटकर रह गयी है।असल जिंदगी में तो और ही बात चलती है;और ही खेल चलता है। मैं कहता हूँ,अगर तुमसे नहीं सम्भलता है;लोगों का कष्ट नहीं दूर होता है,तो तुम अपनी गद्दी छोड़ क्यूँ नहीं देते।क्यों गद्दी पर बैठकर घोटाले पर घोटाले किये जा रहे हो?क्यों एक ही काम बार-बार एक ही जगह पर ज्यादा करते हो?क्यों एक सीमा के बाहर तुम्हें कुछ सूझता नहीं है?बस बने हुए को बिगाड़ रहे हो।

जो थोड़ा-बहुत अच्छा है,उसे भी गन्दा कर रहे हो।आखिर क्यूँ?पटना का पानी पुनपुन में गिरा रहे हो और पुनपुन के किनारे रहनेवाले तमाम लोगों की रातों की नींद छीन रहे हो।तुम गंगा को निर्मल और साफ करने की बात करते हो।इतना भी दिमाग नहीं काम करता कि जबतक गंगा में गिरनेवाले पानी को साफ नहीं किया जायेगा तबतक गंगा साफ नहीं हो सकती।

माफ़ करना!मेरे शब्द थोड़े तल्ख़ हो रहे हैं।पर इसमें गलती तुम्हारी है।रात- भर मच्छरों के कारण सो नहीं पाया हूँ।मुझे दुःख है कि मैं तुम्हारे राज्य में पैदा हुआ हूँ।और दुःख के कारण ही 'आप' की जगह 'तुम'बोल रहा हूँ,क्योंकि एक दुःखी व्यक्ति और आक्रोश से भरे व्यक्ति से तुम्हें आदर की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।

वैसे भी,जैसे ही तुम अपना काम अच्छा नहीं करते हो,छोटे हो जाते हो।फिर तुम्हें मैं आप कहूँ,मन नहीं करता। तुम जिस दिन अच्छा काम करोगे,उस दिन मैं आप कहूँगा।जब पुनपुन के किनारे रहनेवाले तमाम लोग या तुम्हारे राज्य की जनता सुखी हो जायेगी तब न सिर्फ मैं आप कहूँगा बल्कि प्रणाम भी करूँगा,वो भी पैर छूकर।

तो पार्थना है आपसे(भाव में बहकर तुम कह जाने के लिए क्षमा) कृपया कुछ कीजिये।कोई भी दुःखी न हो,रात भर न जगे और न ही कुछ बोलने पर विवश हो,इसके लिए सदुपाय कीजिये। मैं सबसे कह रहा हूँ।सभी से,जो भी इस शुभकार्य में सहयोग या मदद कर सकते हैं।

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