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आईपीएस अमित लोढ़ा की कलम से बिहार में जंगलराज के खात्मे की कहानी

एक समय बिहार में जब अपराधियों की तूती बोलती थी, उस समय सरकार के भरोसेमंद पुलिस अफसरों में से एक थे.वर्तमान में जैसलमेर में बीएसएफ के डीआईजी अमित लोढ़ा. श्री लोढ़ा 1998 बैच के बिहार कैडर के आईपीएस अफसर हैं. आमतौर पर मीडिया के चकाचौंध से दूर रहनें वाले अमित हाल के दिनों में चर्चा में हैं अपनी किताब को लेकर. कभी जिन हाथों से अपराधियों के छक्के, उसी नें इसबार कलम से अपना जादू दिखाया है.

2005-06 में शेखपुरा के एसपी रहते वहाँ का आतंक विजय सम्राट(काल्पनिक नाम) को पकड़नें की पूरी कहानी को पिरोया है उन्होनें अपनी किताब 'बिहार डायरीज' में. 2005 में बिहार की जनता नें राजद के जंगलराज को छोड़कर नीतिश कुमार को चुननें का फैसला किया. वास्तव में बिहार नें 1990 से 2005 के साल में हजारो मर्डर, अपहरण और डकैती की घटनाओं को देखा था,. एक समय था जब दिन में कहीं दूर जानें से , या फिर सूरज ढ़लते घर से निकलनें में एक डर होता था.

नितीश कुमार नें सीएम बनते हीं सबसे पहला नारा दिया 'सुशासन' का. और इसको साकार करनें का जिम्मा मिला राज्य के कुछ खास पुलिस अफसरों को. जिन अफसरों पर सरकार को ज्यादा भरोसा था, उन्हें उन क्षेत्रों में भेजा गया जहाँ जंगलराज का बोलबाला था. 1998 बैच के आईपीएस अफसर अमित लोढ़ा को शेखपुरा की कमान सौंपी गयी. सरकार का साफ निर्देश था कि हर हाल में अपराधियों को गिरफ्तार किया जाए.

उस समय शेखपुरा का आतंक हुआ करता था विजय सम्राट. उसकी पहुँच न केवल शेखपुरा बल्कि आसपास के 5 से 6 जिलों में था. उसनें एकबार तो दो रात के बीच 15 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था जिसमे एक पूरा परिवार साफ हो गया था.उसनें एक सांसद, विधायक और बीडीओ सहित बहुतों का मर्डर किया था..उस समय वहाँ सड़कों की हालत बेहद खस्ता थी, एक ढंग का स्कूल नहीं था, बस था तो केवल आतंक. वे कहते हैं कि उनकी पत्नी हर मोर्चे पर उनके साथ खड़ी रही.

यहाँ तक की जब स्कूल नहीं थे, तो बच्चों को खुद होम ट्यूशन दिया करती थी. वे इससे पहले शहरी इलाकों मुजफ्फरपुर, नालंदा और पटना में एसपी थे इसलिए ग्रामीण क्षेत्र का विशेष तजुर्बा नहीं था. लगातार घट रही घटनाओं से एसपी अमित लोढ़ा पर भारी दबाव था. सारे घटनाओं का जड़ था विजय सम्राट. लोढ़ा नें हर हाल में उसे पकड़नें का निश्चय किया. विजय सम्राट को पकड़नें के लिए एसपी नें जिले में पूरी दबिश बना दी. सूचना के आधार पर पुलिस उसे पकड़नें झारखंड और पश्चिम बंगाल भी गई.

अंत में उसे गिरफ्तार कर लिया गया और आजीवन कारावास की सजा भी दिलवाई. अमित लोढ़ा कहते हैं कि सिर्फ उन्होनें हीं उसे नहीं पकड़ा, उनके सिपाही, हवलदार, कांस्टेबल सबनें जान की बाजी लगाकर पकड़ा. मशहूर लेखक चेतन भगत के आईआईटी दिल्ली में बैचमेट रहे अमित लोढ़ा नें नालंदा में 'संभव' नामक संगठन बनाकर युवाओं को समाज के विकास की ओर खींचा.

लोढ़ा टीओआई में ब्लॉग भी लिखते हैं. बेगूसराय में नक्सलियों के खात्में का श्रेय अमित लोढ़ा को हीं जाता है. 2008 में जब वे बेगूसराय के एसपी थे, उनके नेतृत्व में नक्सलियों के खिलाफ जबर्दस्त ऑपरेशन चलाया गया . इसमें 12 नक्सली गिरफ्तार हुए जिनके पास से पुलिस रायफल के साथ साथ चार रेगुलर रायफल, एक पिस्टल, 92 राउंड गोली और डेटोनेटर मिला था. इसके बाद से बेगूसराय में कभी नक्सलवाद नहीं पनपा.

2016 में राष्‍ट्रपति द्वारा उन्हें वीरता पुरस्कार दिया गया. 2018 में बीएसएफ के डीआईजी रहते उन्हे वीरता पुरस्कार दिया गया. बिहार के जिलों में उनके अच्छे कार्यों के लिए तारीफ़ होती है. किताब में उन्होनें जिस विजय सम्राट को पकड़नें का जिक्र किया है. घटनाओं के अनुसार वह वास्तव में अशोक महतो गिरोह का कुख्यात शूटर पिन्टू महतो हीं है.

वे कहते हैं कि इस किताब से बिहार के बारे में लोगों की गलत धारणा खत्म होगी. अब चर्चा ये है कि निर्देशक नीरज पांडेय उनके किताब पर फिल्म बनानें जा रहे हैं जिसे ट्विंकल खन्ना प्रोड्यूस करेंगी. इसमें अमित लोढ़ा की भूमिका खिलाड़ी कुमार यानि अक्षय कुमार निभा सकते हैं.

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