कविता: माहवारी

कभी सोचा है वह कितना दर्द सहती है,
फिर भी कुछ नहीं कहती है,
बस सब की सुनती रहती है,
उस अवस्था में उसको अपवित्र बताया जाता है,
यदि वह घर से बाहर निकले तो गंदा उसका चरित्र बताया जाता है,
शर्म के मारे सबके आगे लाज छुपाए रहती है ,
कोई देख ना ले इसके कारण दाग छुपाई रहती है,
दर्द से कराहती चुप्पी साधे बस सब की सुनती जाती है,
घर और मंदिर सब कामों से वर्जित कर दी जाती है,
जरूरत उसको रहती सबके सहारे और प्यार की,
पर खाती रहती उसको बातें सब के दुर्व्यवहार की,
हर मास जब रक्त बहे तो अशुद्ध बताया जाता है,
जन्म काल जब रक्त बहे तो प्यार जताया जाता है,
कोई न जाने इसकी पीड़ा, ना कोई साथ निभाता है,
नारी ही तो शक्ति स्वरूपा नारी खुद ही विधाता है

रोहिणी झा

देश का द्वेष

ऐसे कैसे यूँ ही हार जाएं हम!

कविता: भूले ना अपनी ज़िम्मेदारी तभी थमेगी ये महामारी

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