नीली जर्सी में ‘माही’ अब कभी नहीं मारेगा

सूरज अस्त हो गया है! हां जी, सुबह से दोपहर, दोपहर से शाम और अब अंधेरा छा गया है एक नई सुबह के इंतज़ार में। लेकिन उस सुबह-दोपहर-शाम का क्या, जो बीत गया। यह संसार का नियम है लेकिन हम भी अपने जगह सही है। एक सुनहरे भविष्य की राह में उस ‘भूत’ को कैसे भूल जाएं जिसने कई सारी अविस्मरणीय यादें दी है। चलिए अब मुद्दे पर आते हैं।

टीम इंडिया का मैच चल रहा हो। किसी कारणवश घर से बाहर होने की वजह से मैच की कॉमेंट्री नहीं सुन पा रहा हूं.. रास्ते चलते किसी से पूछ लिया “भईया,‌स्कोर क्या हुआ?” सामने से जवाब आया XYZ रन पर 4 या 5 विकेट। तपाक से मेरा सवाल….”धोनी है न?”, जवाब हाँ में..और सुकून के साथ मेरा वहां से प्रस्थान करना। यह महज़ छोटा सा प्रसंग है लेकिन यह अपने आप में उस युग की कहानी बयां करता है जिसे बच्चे से लेकर बूढ़े तक सब सुनना चाहते हैं, सब सुनाना चाहते हैं। मुझसे पूछो की दुनिया में सुकून क्या है, तो मैं कहूंगा ‘माही का क्रीज पर होना’।

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2004-05 की बात है। ऑस्ट्रेलिया में एडम गिलक्रिस्ट थे, श्रीलंका में कुमार संगकारा, दक्षिण अफ्रीका में मार्क बाउचर विकेटकीपर थे। लेकिन टीम इंडिया के पास वनडे में एक ऐसा स्थायी विकेटकीपर नहीं था जो अकेले मैच मोड़ ले। राहुल द्रविड़ थे तो सही, लेकिन काम चलाने के लिए..और वनडे के हिसाब से बैटिंग काफी स्लो थी। पार्थिव पटेल और दिनेश कार्तिक का आना जाना लगा हुआ था।

तभी झुल्फियों मतलब लंबे बालों में एक लड़का टीम में एंट्री मारता है। 23 दिसंबर को बांग्लादेश के खिलाफ डेब्यू मैच था। मोहम्मद रफीक की एक गेंद को स्क्वायर लेग की तरफ खेला.. रन के लिए दौड़े लेकिन साथी पार्टनर मोहम्मद कैफ नें वापस भेज दिया। वापस क्रीज में जाते तबतक गिल्लियां बिखेरी जा चुकी थी। उस समय रांची का यह लड़का खाता भी नहीं खोल सका था। पहली अंतर्राष्ट्रीय पारी..और उसमें भी शून्य, कितना खला होगा उसे।

अब लगभग 15 साल आगे चलते हैं। इंग्लैंड में 2019 विश्वकप का सेमीफाइनल चल रहा है, भारत और न्यूजीलैंड के बीच। टीम इंडिया की स्थिति डांवाडोल है, फिर भी उम्मीद है, क्योंकि वहां माही मौजूद है। लेकिन इस बार के माही के पास लंबे बाल नहीं है, छोटे लेकिन पक चुके, सफेद होते बाल जरूर हैं। यह धोनी के क्रिकेट करियर के ‘शाम’ की बानगी दे रहा है। मैच चल रहा है..इतने में उन्होंने एक शॉट खेला लगभग ठीक वैसा हीं जैसा तकरीबन 14 साल पहले खेला था.. इस बार एक रन तो बना लेकिन दूसरे रन से पहले मार्टिन गुप्टिल ने स्टंप में एकदम ‘कंचे’ वाला निशाना दे मारा।

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रन आउट से शुरू हुआ सफ़र, रन आउट पर समाप्त हो गया। माही यानि‌ महेंद्र सिंह धोनी नें इंटरनेशनल क्रिकेट को अलविदा कह दिया। विश्वकप की वह पारी उनकी आखिरी पारी रही। लेकिन इन दो रन आउट के बीच एक ऐसा इतिहास लिखा गया जिसे ‘माही’ युग की संज्ञा दी जाएगी । रन आउट से शुरू और रन आउट से समाप्त होने वाले धोनी के करियर में  विकेटों के बीच चीते सी फूर्ति देखी गई…

उन्होंने न जाने कितने एक को दो और दो को तीन रनों में बदला। टीम इंडिया को दो दो विश्वकप दिलाया, चैम्पियंस ट्रॉफी का चैंपियन बनाया, टेस्ट में बेस्ट कहलवाया। धोनी भारतीय क्रिकेट में विश्वास का वह नाम था जिसके होने भर से रन रूपी पहाड़ की ऊँचाई कम नज़र आती थी। 2007 टी-20 विश्वकप के फाइनल का फाइनल ओवर अनुभवहीन जोगिंदर शर्मा से फेंकवाने का काम दुनिया में अगर कोई कप्तान कर सकता था, तो वह धोनी थे। 2011 विश्वकप के फाइनल में तीन विकेट जल्दी गिरने पर अपने आप को इनफॉर्म युवराज से ऊपर प्रमोट करके फ्रंट से लीड करने का काम कोई कर सकता था, तो वह धोनी थे। सौरव गांगुली नें अगर टीम इंडिया को जीतना सिखाया तो महेंद्र सिंह धोनी नें जीतने की आदत डाली।

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आप चाहो तो धोनी को अभिमानी कहो, चाहो तो आप उन्हें कई सीनियर खिलाड़ियों के रिटायरमेंट का ज़िम्मेदार कहो.. लेकिन एक बात ज़रूर मान लेना, वह धोनी है जो दूसरा न कभी था, न कभी होगा।  भाग्यरथ पर सवार वह ऐसा बाजीगर था जो बड़े बड़े धुरंधरों को धूल चटाना अच्छी तरह जानता था। वह विकेट के पीछे से शतरंज की चाल चलता था। हारी हुई बाजी को जीत में कैसे बदलना है, वह धोनी से बेहतर भला कौन जान सकता है। धोनी के इंटरव्यू इक्के दुक्के हीं मिलेंगे क्योंकि वह चुपचाप अपना काम करते थे। वह शांति से आए, शांतिपूर्वक चले भी गए लेकिन 15 वर्षों में टीम इंडिया के लिए जो कुछ किया, वही सफलता आज शोर मचा रही है। क्रिकेट लाखों करोड़ों की मोहब्बत है… अधिकतर से आप अगर कारण पूछोगे तो वह कहेगा ‘माही’।

वापस चलते हैं 2019 विश्वकप के सेमीफाइनल की तरफ। मार्टिन गुप्टिल का थ्रो… और  दिल धक से बैठ गया। उम्मीदें टूट गई थी। उससे बड़ी बात की ‘कभी न हारने वाला’ वह योद्धा भावुक था..उसके कदम लड़खड़ाते हुए दिख रहे थे, आंखों में एक दर्द था…तभी लगा कि वह आखिरी बार नीली जर्सी में रणभूमि से वापस जा रहा है। वह दर्द ऐसा था जिसे धोनी के चेहरे पर पहले कभी नहीं देखा गया था। अनुमान लगाया गया कि  रात को संन्यास का ऐलान हो सकता है।

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लेकिन वह महेंद्र सिंह धोनी कहां, जिसे हर कोई पढ़ सके। वह अप्रत्याशित और अचंभित करने वाला फैसला लेने में माहिर हैं। तमाम अटकलबाजियां धरी की धरी रह गई। उम्मीद थी कि 2020 टी20 विश्वकप में धोनी खेलेंगे लेकिन कोविड-19 महामारी नें सभी अरमानों पर पानी फेर दिया। 15 अगस्त को जब हम आज़ादी से 73 साल पूरे होने की वर्षगांठ मनाकर प्रफुल्लित हो रहे थे। आईपीएल की तैयारियां जोरों पर थी। किसने सोंचा था कि महेंद्र सिंह धोनी के रिटायरमेंट की खबरें आ जाएंगी। लेकिन वह धोनी हैं जो हमेशा अप्रत्याशित हीं करते हैं। पहले एक लेटर भेजा बीसीसीआई को और फिर इंस्टाग्राम पर लिखा कि ‘इसी वक़्त से मुझे अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट से रिटायर माना जाए’। भावनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा। इसके तुरंत बाद उनके करियर में हमेशा साथ रहे साथी सुरेश रैना नें भी अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह दिया। अब अगर दोस्ती की मिसाल दी जाएगी तो धोनी-रैना से बेहतर उदाहरण ढूंढना मुश्किल होगा। ‘धोनी हैं ना’ और ‘रैना हैं न’ अब नहीं में बदल चुका है।

7 नंबर की जर्सी में रहनेवाला बाजीगर ब्लू जर्सी में कभी न दिखेगा अब। टीम में कोई दूसरा बैट्समैन तो आ हीं जाएगा लेकिन जो भरोसा धोनी में था…वह किसी और में कहाँ! दोनों आईपीएल खेलते रहेंगे…और हम दिसंबर 2004 से जुलाई 2019 के बीच की हाइलाइट्स में उन्हें नीली जर्सी में देखा करेंगे, फिर ताजा करेंगे उन यादों को जो बचपन से अबतक मिली है। शुक्रिया महेंद्र सिंह धोनी और सुरेश रैना, आप हमारे दिलों में स्थायी रूप से हमेशा के लिए शिफ्ट हो चुके हैं। लेकिन अफ़सोस…अब माही नहीं मारेगा! अंत में 2011 विश्वकप के फाइनल में महेंद्र सिंह धोनी के बल्ले से निकले विश्व विजयी छक्के पर कॉमेंट्री कर रहे रवि शास्त्री के उन‌ शब्दों के साथ छोड़े चलते हैं..जो हर किसी के जेहन में कैद हो चुका है। “Dhoni finishes off in style. A magnificent strike into the crowd! India lift the World Cup after 28 years!”

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Ankush M Thakur

Alrounder, A pure Indian, Young Journalist, Sports lover, Sports and political commentator

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