देश

आनंद किशोर बाबू पहले जमकर पढ़ाई, फिर किजिए कड़ाई

लगातार हाँ-ना, आज-विहान, की अनिश्चितताओं के बीच आखिरकार देश-प्रसिद्ध बिहार माध्यमिक शिक्षा बोर्ड नें 10वीं के परिणाम घोषित कर दिए| इंटर की परीक्षा में ज्यादातर विद्यार्थी के फेल होनें के बाद, टॉपर गणेश कुमार के लिटमस टेस्ट नें बड़ी बदनामी करायी|

इससे सबक लेकर आनंद किशोर की टीम नें रिजल्ट जारी करने से पहले देर जरूर की, लेकिन यह सिर्फ टॉपर वेरिफिकेशन से लेकर साफ-सुथरे रिजल्ट के लिए था| स्टूडेंट्स के मन में रिजल्ट को लेकर बेचैनी इस कदर थी, मानों भारत-पाकिस्तान का मैच हो और धोनी चोटिल हो| कौन सा परीक्षार्थी होगा जो ये नहीं कहेगा कि मैंने बहुत अच्छा लिखा है, अच्छे नंबर भी आयेंगे|

लेकिन यह बिहार बोर्ड है जिसकी लीला अपरंपार है, यहाँ लोग टॉपर होनें से भी डरते हैं, पता नही कब टीवी चैनल्स का कैमरा उनकी ओर मुड़ जाए.. और थोड़ा असहज क्या हुए, न्यूज बन जायेगी.. लो जी आ गया एक और 'टॉपर' घोटाला| मानाकि खोजी पत्रकारिता के नाम पर मीडिया घरानों नें सारी मर्यादा लाँघनें में कोई कमी नहीं की, लेकिन बिहार के शिक्षा व्यवस्था नें भी कम शर्मसार नहीं किया है|

सभी राज्यों में ऐसा होता है, आनंद किशोर सहित हमारे आपके जैसे लोगों के कहने के लिए तो है , लेकिन आखिर हमनें बदनामी के मौके हीं क्यों दिए , इसका जवाब किसी के पास नहीं है| बिहार एक ऐसा राज्य है, जो देश को सबसे ज्यादा ब्यूरोक्रेट्स देता आया है| ऐसा तभी संभव होता है, जब पढ़ाई लिखाई का लेवल सुपर से भी ऊपर हो|

बिहार बोर्ड से पढ़ा हर इंसान अपनेआप पर गर्व महसूस करता है, क्योंकि इसकी किताबें वाकई में ज्ञान का भंडार है| यह बात अलग है कि यहाँ स्कूलों में न तो उचित सुविधाएँ हैं, और ना हीं अच्छे टीचर| फिर भी अगर स्टूडेंट वह सबकुछ कर सके , जो वह चाहता है, तो इसे बड़ी बात नही हो सकती| इसबार लगभग 51% स्टूडेंट पास हुए हैं, जिसमें 14% प्रथम श्रेणी से अपना परचम लहराये हैं|

यह भी पढ़ें :कभी शिक्षा से गौरव कमाने वाला यह राज्य आज अपनी थू थू करवा रहा है

'टॉपर' निकालने की फैक्ट्री के नाम से मशहूर जमुई के सिमुलतला विद्यालय ने भी टॉप 10 में से 6 छात्र दिए हैं, फिर भी टीचर नाखुश हैं| कारण है, कि हमेशा स्टेट टॉपर इसी स्कूल का होता था, लेकिन इस बार लखीसराय के प्रेम कुमार टॉपर बने हैं|

झारखंड के नेतरहाट विद्यालय की तर्ज पर बना सिमुलतला के टीचरों की तरह हीं जज्बा, सभी स्कूल में हो जाए , फिर तो बल्ले बल्ले हैं| बिहार बोर्ड में 90% से ज्यादा लाना, और क्रिकेट का वर्ल्डकप जीतना या माउंट ऐवरेस्ट चढ़ना बराबर है| लेकिन प्रेम कुमार नें सारे बाधा विघ्नों को चीड़कर, मीडिया के कैमरों की चिंता किए बगैर 93% नंबर लाए, जो अद्भुत उपलब्धि है|

फिर भी सवाल वही, कि फेल का ग्राफ 49% क्यों रहा| जब आप अंदर की तहकीकात को करने की कोशिश करेंगे तो जवाब बाहर से हीं मिल जायेगा| मुजफ्फरपुर जिले में 25 किलोमीटर अंदर उत्क्रमित मध्य विद्यालय सिरकोहियाँ है, जो कुछ वर्ष पहले प्रोन्नति पाकर उच्च विद्यालय बना है|

इस स्कूल में उच्च विद्यालय स्तर के एक भी गुरूजी नहीं हैं, फिर स्टूडेंट पास कैसे हों| इस बार के रिजल्ट में स्कूल टॉपर को 290 नंबर है अर्थात सेकंड डिवीजन... मतलब कोई भी स्टूडेंट प्रथम श्रेणी से पास नही हुआ है| यह तो एक बानगी मात्र है, ऐसे हजारों स्कूल हैं, जहाँ का हाल ऐसा हीं है|

इसका सीधा अर्थ है कि जब बच्चे पढ़ेंगे नहीं, तो परीक्षा में अलादीन का कोई चिराग तो मिलेगा नहीं, कि लो और लिख लो, टॉप कर जाओ| अपने मेहनत के बल पर पढ़नें वाले इक्के दुक्के है, और जब प्रोत्साहन देने की बारी आती है तो मास्टर साहेब से लेकर अफसर बाबू तक बगलें झाँकते नजर आते हैं|

यह बात किसी से छुपी नहीं है कि बिहार में बेमिसाल प्रतिभाएँ हैं लेकिन उन हीरों को तराशनें वाला कोई जौहरी है हीं नहीं, और जो है भी वो तराशनें आना नहीं चाहता| सबका मूल कारण है कि खराब रिजल्ट कड़ाई की वजह से नहीं, पढ़ाई न होने के कारण होता है|

329 total views, 2 views today

Facebook Comments

Leave a Reply