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सुनों बेंगलूर वालों.. 'हिंदी हमारी मातृभाषा थी, है और हमेशा रहेगी'

बेंगलूरू मेट्रो में अगर आप कभी यात्रा करने जाएँगे, तो मेट्रो के साइनबोर्ड तीन भाषा में लिखे हुए मिल जाएँगे..कन्नड़, अंग्रेजी और हिंदी | तीन भाषा का होना कोई गड़बड़ नही है, आखिर सब जगह की अलग अलग भाषा जो है| दिल्ली में हिंदी, इंग्लिश के साथ उर्दू एक हीं बोर्ड पर आराम फरमाते मिल जाते हैं|

लेकिन इन सबसे अलग ई बेंगलूर वाले को हिंदी से बड़ा टेंशन हो रहा है| कुछ 'चिंदीचोर' नेता भी है जे इहे तवा पर अपन रोटी सेंकने के फिराक में है| इनको ई थोड़े हीं पता है कि इसका घाटा का होगा, बस अपना काम बनता तो भांड़ में जाए जनता|बेंगलूर वालों का कहना है कि हमको कन्नड़, इंग्लिश चाहिए लेकिन हिंदी को जितना जल्द हो सके, हमसे दूर किया जाए|

बेंगलूर मेट्रो में हिंदी साइन बोर्ड होने पर विरोध

हिंदी को बड़े प्रेम से लोग राष्ट्रभाषा कहते नहीं थकते हैैै, लेकिन बेंगलूर नें एक चिकना आईना दिखाया है..  हिंदी की क्या इज्जत है, आँखे फाड़ फाड़ के देख लो| 2011 से बेंगलूर में 'नम्मा मेट्रो' सरपट भाग रहा है, लेकिन आजतक लड़ाई झगड़ा वाली तो कोई बात हीं नही हुई| कन्नड़ और अंग्रेजी समर्थक के तर्क को सुनकर आप एकाध ग्लास  पानी जरूर माँग सकते हैं|

उनका कहना है , कि हिंदी राष्ट्रभाषा नही है, इसलिए मेट्रो के साइनबोर्ड त्रिभाषी न होकर के दोभाषी होनी चाहिए|अरे बेंगलूर वाले भईया लोग, कहाँ से पता चला कि हिंदी राष्ट्रभाषा नही है|जिस देश में 461 भाषा बोली जाती हो, और वहाँ भी 41% लोग हिंदी समझते और बोलते हों तो क्या कन्नड़ और अंग्रेजी वहाँ की राष्ट्रभाषा होगी|जब अंग्रेजी राष्ट्रभाषा है हीं नहीं, तो लोग कैकेयी-विलाप काहे कर रहे हैं|

अब जरा देखते हैं कि अपने बात को राजा हरिश्चन्द्र वाला सच साबित करने के लिए ये कौन सा तर्क दे रहे हैं|उनका कहना है कि दिल्ली मेट्रो में भी तो बोर्ड पर दो हीं भाषा है| लेकिन उन्हे कौन समझाए, कि दिल्ली देश की राजधानी है, जहाँ बहुतों भाषी बोलनेवाले लोग रहते हैं|अगर सब भाषा को साईनबोर्ड पर लिख दिया जाए तो भाषा तो दिखेगी लेकिन दिल्ली मेट्रो गायब हो जाएगा| एक तर्क है कि दुबई, हांगकांग, और क्वालालामपुर मेट्रों में दो हीं भाषा है, तो बेंगलुरू में क्यों नही|

इसका सीधा जवाब है कि उस शहर हीं नहीं, देश की राष्ट्रभाषा भी एक हीं है, और अंग्रेजी तो विश्वव्यापी भाषा है| तमिल मेट्रो में दो भाषा है, अंग्रेजी और तमिल... ऐसा इसलिए क्योंकि संविधान की राष्ट्रभाषा अनुच्छेद में तमिलनाडु को कुछ छूट मिली हुई है|इस आधार पर तो सारे के सारे लॉजिक की हवा निकल गई...

शशि थरूर जैसा विद्वान इंसान भी जब बोलता है, कि 'हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है, इसे किसी पर थोपा नही जा सकता' , तो समझ में आता है कि पत्नी की मौत के बाद यह इंसान किस हद तक मानसिक रूप से असंतुलित हो चुका है|मोदी जी के मंत्री वैंकैया नायडु ने कहा कि '1990 के आसपास  जब वे हिंदीविरोधी अभियान में जुड़े थे, तो हिंदी बोर्ड पर उन्होनें कालिख पोती थी, लेकिन कुछ साल बाद समझ में आया कि उन्होनें बोर्ड पर नहीं, अपने माथे पर कालिख डाली थी'...

शशि थरूर जैसे लोग उस अंग्रेजी व्यवस्था के चट्टे-बट्टे हैं जो रहते तो  हिंदुस्तान में हैं , लेकिन इन्हे हिन्दुस्तान का 'ह' भी नहीं पता| खाते तो भारतीय थाली में हैं लेकिन 'अंग्रेजी टॉयलेट' यूज करते हैं| उसी हिंदी बोलने वालों की मेहनत से उपजी हुई रोटी को खाते हैं लेकिन पक्ष हमेशा अंग्रेजी की लेते हैं|हिंदी की ऐसी बेइज्जती करना वैसा हीं है जैसे अपनी माँ को धक्के देकर घर से बाहर निकालना|

बेंगलूरू मेट्रो का नाम हीं है 'नम्मा मेट्रो'...जिसका अर्थ होता है 'हमारा मेट्रो'... अगर इन शब्दों के सहारे वे लोग मेट्रो को अपना मानने की गलती करते हैं, तो भगवान हीं उनकी रक्षा करें| बेंगलूर में 25 अलग अलग राज्यों के तरह तरह की भाषा बोलने वाले लोग रहते हैं जिसमें अधिकतर हिंदी भाषा जानने वाले हैं|

हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है, थी और हमेशा रहेगी

कुछ समय पहले राज ठाकरे नें हिंदी के खिलाफ अभियान चलाया था लेकिन बाद में उनकी हवा निकल गई|बेंगलूर वालों को यह समझना होगा कि जिस हिन्दी के खिलाफ है, उसके बिना उनकी कल्पना मुश्किल है|कन्नड़ और अंग्रेजी के 10 लाख से ऊपर समर्थक, ट्विटर पर #NammaMetroHindibeda कैंपेन का हिस्सा बन चुके हैं|

हालांकि बेंगलूर मेट्रो कॉरपोरेशन नें अपनी भाषा नीति तैयार कर ली है जिसमें हिंदी को पूर्ण रूप से जगह मिली है|कन्नड़ और अंग्रेजी समर्थकों के लिए एक साफ संदेश है 'हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है, थी और हमेशा रहेगी'

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