जब साल 1988 में अटल जी की 'मौत से ठन गई' | atal bihari vajpayee
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जब साल 1988 में अटल जी की 'मौत से ठन गई'

अटल बिहारी वाजपेयी एक ऐसे शख्स जो भारतीय राजनीति के शिखरपुरुष हैं. जिनका व्यक्तित्व, जिनकी पहचान, जिनका रुतबा औरों से बिलकुल अलग है. जिनका सम्मान अपनी पार्टी के लोग ही नही विपक्ष भी करता है. जिनकी उदारवादी सोंच और दयालु स्वभाव का पूरा हिन्दुस्तान कायल है. वो अभी देश के प्रतिष्ठित अस्पाल दिल्ली के AIIMS में मौत से जंग रहे हैं. वाजपेयी यहाँ पिछले दो महीने से भर्ती है. उन्हें 11 जून को किडनी में हुए इन्फेक्शन के कारण AIIMS में भर्ती कराया गया था. डॉक्टरों की माने तो उनकी हालत अभी काफी नाजुक है. इसीलिए फिलहाल उन्हें लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया है.

पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी को एक राजनेता के तौर पर जितना प्यार मिला उतना ही उनके लेखन और कविताओं को भी सराहा गया. अटल ने अपने जीवनकाल में कई कविताएँ लिखी जिन्हें काफी पसंद किया गया.

लेकिन जब अटल बिहारी वाजपेयी की मौत से ठन गई थी उस दौरान अस्पताल में ही बेहद ही मार्मिक कविता लिखी . 1988 में किडनी का ईलाज करानें जब वे अमेरिका गए थे तब उन्होनें मौत को सामनें से देख यह कविता लिखी:-

ठन गई!
मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यूं लगा जिंदगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
जिंदगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?

तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आजमा।

मौत से बेखबर, जिंदगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किए,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भंवरों की बांहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ां का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।

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