नल जल योजना बिहार | big messy in bihar naljal scheme
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बिहार: नलजल योजना में भारी गड़बड़ी, हुई जाँच तो साबित हो सकती है सबसे भ्रष्ट योजना

बिहार की नीतीश कुमार सरकार नें राज्य के विकास के लिए 2005 से अबतक कई योजनाएँ ला चुकी है। इसमें कई बेहद सफल रहे जिसमें कन्या पोशाक और साईकिल वितरण योजना, सात निश्चय, बुजुर्गों और विधवाओं के लिए योजना अबतक सफलतापूर्वक चल रही है। लेकिन कुछ नासमझी भरे फैसलों नें लुटिया डुबोने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

लगभग दो साल पहले बिहार सरकार के पीडब्ल्यूडी विभाग द्वारा एक योजना लॉंच की गई नलजल योजना। हर वार्ड में नलजल योजना के तहत एक पानी की टंकी स्थापित करनी है। वहाँ अंडरग्राउंड पाइपलाइन के जरिए सबके घरों तक 30 रूपए मासिक शुल्क के साथ पानी पहुंचाया जाना है। जिन जगहों पर पानी की भारी किल्लत है, वहाँ के लिए यह योजना काफी फायदेमंद है। लेकिन ऐसा नहीं है कि जो दिख रहा है, ठीक वैसा ही हैं।

इस योजना को वार्ड सदस्य के नेतृत्व वाले वार्ड विकास समिति के द्वारा टेंडर निकालकर पूरा किया जाना है। भाई भतीजावाद का शुरू से शिकार होते आए राज्य में अक्सर वार्ड सदस्य अपने सबसे करीबी या रिश्तेदारों को टेंडर देकर सीधा पैसा घर में हीं सप्लाई कर देते हैं। तकरीबन 20 से 25 लाख का टेंडर होता है जिसमें कम से कम खर्च करने की कोशिश की जाती है। यानि जितना बचा ले, उतना फायदा है। इसी लालच में सामान एकदम घटिया क्वालिटी का दिया जाता है। कुछ सप्ताह पहले राज्य के अधिकतर हिस्सों में सीजन की पहली आंधी तूफान आयी थी। नलजल टंकी को इतनी मजबूती के साथ बनवाया गया था कि पहली आंधी में हीं कई जगह टंकी धड़ाम से नीचे आ गिरा।

एक तो सभी जगहों पर इस योजना का काम हुआ नहीं है। जहाँ हुआ भी है, वहाँ लोगों की परेशानी कम होने के बजाय बढ़ गई है। साल दर साल भूजल का स्तर गिरता जा रहा है। नलजल के लिए बैठाई गई टंकी को भरने के लिए 200 फीट से ज्यादा गहराई तक पाइप पहुँचायी गई है। जबकि गाँव में अधिकतर चापाकल की गहराई भी 200 फीट‌‌ के आसपास है। ऐसे में चापाकल सूखने की समस्या आम हो गई है।

अब सवाल उठता है कि क्या वाकई में इसका उपयोग पेयजल के रूप में हो रहा है?। अगर आप इसका जवाब ढूंढने निकलेंगे तो हैरान रह जाएंगे। दरवाजे पर लगी टोंटी से जुड़ी पाइप खेतों में पहुँची है और टोंटी खुली है। यानि लापरवाह, बेपरवाह लोग सरकार के इस योजना की नाकामी पर मुहर लगा देते हैं। सुबह में टंकी भरते हीं कुछ हीं देर में खाली भी हो जाती है। कई जगह तो पानी बिना काम का बहता रहता है। और इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। अगर सरकार ने इस योजना को वार्ड विकास समिति, जिसमें वार्ड पार्षद अध्यक्ष होते हैं, के हवाले किया है। तो इसके जाँच की जिम्मेदारी भी इनकी हीं होनी चाहिए।

इस योजना का ग्रामीण क्षेत्रों में कोई खास उपयोग नहीं है। उल्टे, भूजल स्तर का दोहन चिंता का सबब बनता जा रहा है। जिन विशेषज्ञों नें ऐसा करने की सलाह सरकार को दी होगी, वह निश्चित हीं धरातल से परिचित नहीं होगा। या फिर किसी आरक्षित कोटे से कम योग्यता के बावजूद आकर अपनी सलाह से लपेट रहा होगा।

जिन जगहों पर इसकी जरूरत है वहाँ लगाया जाना चाहिए। जहाँ सबके यहां चापाकल है,वहाँ ऐसा करने की जरूरत हीं कहाँ है। सीवान जिले का एक मामला है। जहाँ वार्ड विकास समिति के साझा अकाउंट में नलजल योजना के 17 लाख रूपए आ गए। इसमें से पैसे निकाल भी लिए गए लेकिन आजतक वहाँ ना पानी की टंकी लगी और ना हीं पाइप बिछी।

फिजूल की योजनाओं पर अरबों खर्च करने के बजाय सरकार को बुनियादी सुविधाओं को मजबूती से जनता तक पहुँचाना चाहिए।मुजफ्फरपुर में जब एईएस दिमागी बुखार से तड़प कर बच्चे मर रहे थे, सरकार के हुक्मरान सो रहे थे। जब बिहार में गर्मी और जल संकट से लोग हलकान थे, सरकार के तरफ से कोई प्रभावी उपाय नहीं किए गए।

लेकिन जिसके फायदे न के बराबर हैं, उसपर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है। अगर इस योजना की जाँच की जाती है, तो निःसंदेह यह आजतक की सबसे भ्रष्ट योजना साबित होगी। इसके कर्ताधर्ताओं पर गंभीर सवाल उठ खड़े होते हैं। इसका पूरा ढांचा सिर्फ ऊपरी स्तर‌‌ से लेकर काम कराने वालों तक के पॉकेट को भरने के लिए बनाया गया है।

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Ankush M Thakur
Alrounder, A pure Indian, Young Journalist, Sports lover, Sports and political commentator
http://www.thenationfirst.com

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