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भारत का भविष्य खतरे में, हर चौथा बच्चा है कुपोषण का शिकार

इंसान को जीवन जीनें के लिए तीन चीजें सबसे ज्यादा जरूरी है वो है खानें के लिए रोटी, पहननें के लिए कपड़ा और रहनें के लिए घर. नौकरी या कोई बिजनेस करनें वालों के मुँह से अक्सर यह सुननें को मिल हीं जाता है कि पेट के लिए हीं तो सब करना पड़ता है. मतलब पेट पालना सबसे बड़ी चुनौती है.

हमारे देश की एक बड़ी आबादी आज भी एक वक्त की रोटी के लिए तरस रही है.  बहुत से छोटे-छोटे बच्चों को भूखे पेट सोना पड़ता है जबकि दूसरी तरफ मध्यम और धनी वर्ग के लोग खाना खाने के बाद बचे हुए खाने को डस्टबिन में डाल देते हैं.

अगर हम हाल ही में आए जी एच आई के सर्वे की बात करें तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि भारत में गरीबी आज भी सर चढ़कर बोल रही है. 2014 में जब नरेंद्र मोदी की सरकार आई थी, भारत का भुखमरी में रैंकिंग 56 था.  जबकि 2018 में यह रैंकिंग घटकर 103वें नंबर पर जा पहुंची है.  आश्चर्य की बात यह है कि इस सर्वे में शामिल 120 देशों में भारत 103 में नंबर पर है.

दुनिया की एक तिहाई भूखी रहने वाली आबादी भारत में

रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की एक तिहाई भूखी रहने वाली आबादी भारत में ही है. जबकि पाकिस्तान को छोड़कर सारे पड़ोसी देश हम से काफी आगे हैं.  दुनिया की सबसे ज्यादा कुपोषित जनसंख्या भारत में ही निवास करती है. इस देश की 14.9% जनसंख्या कुपोषित है.

भारत में प्रतिदिन 196 मिलियन लोग भूखे सोते हैं जिसमें 21 प्रतिशत 5 साल के नीचे के बच्चे हैं. 5 साल के नीचे  के 38.4% बच्चे कुपोषित है. भारत की जनसंख्या का हर चौथा में से एक बच्चा कुपोषण का शिकार है. 125 करोड़ जनसंख्या वाले देश भारत में पिछले दो दशक के अंदर अर्थव्यवस्था में भारी बदलाव हुए हैं.

एक तरफ जहां जीडीपी सारे 4 गुना बढ़ चुकी है वहीं प्रति व्यक्ति खपत भी ढाई गुना ज्यादा बढ़ी है.  इसी दौरान फसलों की पैदावार में भी दोगुनी वृद्धि हुई है.  इसके बावजूद यह देश अपने एक बड़े जनसंख्या को दो वक्त की रोटी मुहैय्या नहीं करा पा रहा है. भारत में 40 पर्सेंट सब्जी और फल तथा 30 पर्सेंट अनाज खराब रखरखाव या उचित मूल्य न मिल पाने के कारण बर्बाद हो जाते हैं.

लेकिन दूसरी तरफ हमारी एक आबादी ऐसी है जो एक वक्त की रोटी के लिए दर-दर की ठोकरें खाती है.  उस परिवार में कमाने वाले के काम करने पर निर्भर करता है कि आज उसके घर में रोटी पकेगी या नहीं.  एक तरफ जहां सरकार अमीर को और अमीर करती जा रही है वहीं दूसरी तरफ भूखे मर रही जनता के लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं है।

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अगर हमें अपने मनपसंद का कोई खाना ना मिले तो हम आंखों सिकोड़ते हैं.  मम्मी से हम मांग करते हैं कि दूसरा कोई व्यंजन दिया जाए. जबकि हमारे देश में प्रतिदिन 244 करोड़ रुपए का खाना बर्बाद हो जाता है. इस हिसाब से देखा जाए तो सालाना 89060 करोड़ रुपए का खाना कूड़े के ढ़ेर में फेंक दिया जाता है. जबकि आंकड़े इतने भयावह हैं कि 3000 बच्चे रोज भूख के कारण अपनी जान गँवाते हैं, फिर भी हमारी आंखे नहीं खुलती.

कभी झारखंड में तो कभी बिहार में,  कभी यूपी में तो कभी पूर्वोत्तर के किसी राज्य में भूख से मरने की खबरें आती रही हैं. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि दुनिया का एक ऐसा देश है जहां लोग मिट्टी की रोटी खाने पर मजबूर हैं. यह है कैरिबियन प्रायद्वीप का देश हैती.

वर्ष 2008 से यह देश तेल के दामों में बढ़ोतरी के कारण गरीबी की मार झेल रहा है. ऊपर से 2010 में आए भयंकर भूकंप और तूफान ने इसे तोड़ कर रख दिया. आज यहां लोग कीचड़ में नमक मिलाकर तवे पर सेकी हुई रोटी खा कर अपना जीवन यापन करते हैं. लेकिन हमारे यहां यह बात समझने के लिए कोई तैयार नहीं होता ना सरकार के पास नीति है और ना ही हमारे देश के लोगों में जागरूकता.

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