बलूचिस्तान दिवस | Hind Baloch Forum celebrating Balochistan day in New Delhi at Constitution Club
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दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में मनाया गया बलूचिस्तान दिवस, बलूचिस्तान के संघर्ष में मदद करने का लिया संकल्प

कांस्टीट्यूशन क्लब, 11 अगस्त, नई दिल्ली: बलूचिस्तान के स्वतंत्रता संघर्ष को हिंदुस्तान के नागरिक सक्रिय मदद करते रहे हैं और हिंद बलोच फ़ोरम एक ऐसा ही नागरिक संगठन है। यह बात फ़ोरम के संस्थापक स्वामी जीतेंद्रानन्द सरस्वती ने बलोचिस्तान दिवस के अवसर पर कही ।

फ़ोरम के अंतरराष्ट्रीय संयोजक गोविंद शर्मा ने बताया कि 11 अगस्त को बलूचिस्तान दिवस के रूप में मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन उन्हें 1947 में अंग्रेजों से आज़ादी मिली थी। इसी क्रम में पाकिस्तान को 14 अगस्त और भारत को 15 अगस्त को आज़ादी मिली थी लेकिन 28 मार्च 1948 को पाकिस्तान ने बलूचिस्तान को ज़बरदस्ती अपने में मिला लिया।

फ़ोरम के राष्ट्रीय संयोजक विनय कुमार ने बताया कि दिलचस्प है कि मो. अली जिन्ना बलोचिस्तान के नवाब के वक़ील रह चुके थे और 11 अगस्त 1947 को बलोचिस्तान को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने वाले दस्तावेज़ पर दस्तख़त भी किए थे। तब बलोचिस्तान को ‘स्टेट ऑफ़ कलात’ कहा जाता था।

प्रो. चंद्रकांत प्रसाद सिंह ने कहा कि बलूचिस्तान के लोग अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर काफ़ी जागरूक रहे हैं और साथ ही दूसरे धर्मों और मज़हबों की सांस्कृतिक पहचान का आदर भी करते रहे हैं, जिसे पाकिस्तान की मुल्लापरस्त सरकार नापसंद करती है। पाकिस्तान के हुक्मरान बलूच लोगों को मुसलमान मानने से ही इनकार करते हैं। इतना ही नहीं बलूचों को आर्थिक विकास में भागीदारी भी नहीं दी जाती है, जबकि पाकिस्तान का 80%खनिज और 40% ज़मीन बलूचिस्तान में है।

इस भेदभावपूर्ण स्थिति से त्रस्त बलूचों ने पाकिस्तान के क़ब्ज़े से आज़ादी का आंदोलन तेज कर दिया है। इसकी शुरुआत 1948 में ही हो गई थी। फोरम के संस्थापक स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती ने कहा कि पिछले वर्षों में 25 हज़ार से अधिक बलूच नागरिक ग़ायब कर दिए गए हैं। पाकिस्तान की सेना यह काम ‘पकड़ो, मारो और फेंक दो’ नीति के तहत करती है जिसे एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाओं ने भी दर्ज किया है।

दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में मनाये गए बलोचिस्तान दिवस में देश के विभिन्न हिस्सों से आए बुद्धिजीवियों ने हिस्सा लिया और इस बात पर आम राय बनी कि दुनिया भर में बसे भारत के लोगों को बलूचिस्तान के संघर्ष में तन, मन और धन से सहयोग करना चाहिए।

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