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रेल की पटरियों पर चलनें में कैसी बहादुरी

अमृतसर में ट्रेन ने सैकड़ों लोगों को कुचला नहीं बल्कि हमारी उस सोच को रौंद दिया जिसमें हम पटरी पर चलना बहादुरी समझते हैं. यह जानते हुए भी कि उस पटरी पर चलनें का पहला और एकमात्र अधिकार उस ट्रेन का है. फिर भी ना जानें क्यों, हम अपनी गलती समझते नहीं और दोष रेलवे और उसकी व्यवस्था को देते हैं. हवा में चलनें का अधिकार विमान का है लेकिन अब उसमें आप पैराशूट लगाकर रूकावट डालेंगे तो यह नासमझी का हीं प्रतीक है.

अक्सर हम सड़क पर चलते हुए भी बीचोबीच चलते हैं जबकि गाड़ियाँ हॉर्न पर हॉर्न देती रहती है. जब टक्कर होती है, तो वही सड़क जाम, पुलिस पर पथराव और प्रशासन से मुआवजा लेनें की स्थिति आ जाती है. सरकार को भी क्या, आपका पैसा, वापस मुआवजे के रूप में आपको हीं लौटा देती है. समाचार पत्र में आए दिन यह खबर मिलती है कि ट्रेन से कटकर अज्ञात की मौत. फिर भी हम पटरी से हटकर चलनें को तैयार नहीं.

अगर कोई ट्रेन समय से लेट हो जाए तो हंगामा शुरू करते हैं, फेसबुक पर लंबी पोस्ट करते हैं , ट्विटर पर रेल मंत्री को ट्वीट करते हैं लेकिन जब अपनी जिम्मेदारी आती है तो सब पीछे हट जाते हैं. चेन पुलिंग करके अपनें गंतव्य पर उतरनें की घटनाएँ अक्सर होती है. अमृतसर हादसे के बाद बात हो रही थी कि भीड़ देखकर ड्राइवर को ट्रेन रोक देनी चाहिए थी, इमरजेंसी ब्रेक लगाना चाहिए था. इंसान को यह पता होते हुए कि पटरी पर ट्रेन आएगी, लोग ऐसे बैठे थें मानों शादी के टेंट में आकर बैठे हो. इस बीच अफवाह फैली कि चूंकि ट्रेन का ड्राइवर मुस्लिम था इसलिए उसनें कुचल दिया. बेवकूफ इंसानों, ड्राइवर किसी धर्म विशेष की गाड़ी नहीं चलाता. उसे यह नहीं देखना कि हिंदू को बचाना है या मुस्लिमों को. वह निरपेक्ष होता है

लेकिन कुछ अनारी लोग इसे धार्मिक रंग देनें में जरा भी संकोच नहीं करते. सुदर्शन चैनल के मालिक का ट्वीट आता है. जिसमें वे कहते हैं कि नमाज पढ़नें के लिए ट्रेन रोका जा सकता है तो रावण दहन के लिए क्यों नहीं?. एक राष्ट्रीय चैनल के मालिक द्वारा इतना घटिया बयान निश्चित रूप से संकीर्णता दिखाता है. जब रेलवे गुमटी का फाटक बंद होता है तो हम जल्दी निकलनें के लिए साईकिल या बाइक को उलट पुलट कर निकाल लेते हैं. लेकिन इसी दौरान गलती हो गई, तो दोष रेलवे का है. यह इस देश का दुर्भाग्य है कि यहाँ किसी भी दुर्घटना में गलती हमेशा बड़ी गाड़ी वालों का हीं माना जाता है. समझदारी तो यह है कि हम रेल को उसके जगह पर चलनें दें. वो हमारे राह में रोड़े नहीं डालता तो हम उसके पटरी पर जाकर नमस्ते नमस्ते क्यों करनें लगते हैं.

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