अम्बेडकर मेरे हैं
विचार

अम्बेडकर मेरे हैं

आज-कल सभी राजनीतिक दलों में एक अजीब सी होड़ मची हुई है. मैं यहाँ 'अजीब' इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि ये कोई ऐसी-वैसी होड़ नही है, ये होड़ है हमारे संविधान के जनक बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर को अपना बनाने की, उस पर अपना राजनीतक ठप्पा लगाने की . आज देश के सभी राजनीतिक दलों की अम्बेडकर को लेकर एक ही विचार और एक ही भाषा है... वह ये कि "अम्बेडकर मेरे हैं".

एक तरफ राजनीतिक दल अम्बेडकर पर अपना मोहर लगाने से नहीं चुक रहे तो वही दूसरी ओर शायद लोगों का ध्यान इस मूल सवाल से हट गया है कि अम्बेडकर कौन हैं ? और अम्बेडकर की सबसे अधिक जरुरत किसे है ? इस समाज को या फिर राजनीतिक दलों को ?

आज मैं अम्बेडकर के बारे में चर्चा इसलिए नहीं कर रहा हूँ कि अम्बेडकर जैसे महान वक्ति के विचार इस समाज से खत्म होते जा रहें हैं  और मैं उसे थोड़ी-बहुत बचाने की कोशिश कर रहा हूँ बल्कि मैं इसलिए कर रहा क्योंकि उनके विचारों को इस देश और समाज से ख़त्म करना असंभव है.  लेकिन वर्तमान समय में समाज उनके विचारों के ठीक विपरीत चल रहा है और अम्बेडकर को मात्र एक वोट पाने का मोहरा बना कर सारे राजनीतिक दल दलितों का वोट अपने झोली में डालना चाहते है उनके विचारों से उन्हें कोई लेना देना नहीं है ।

अम्बेडकर की ही देंन है की आज भारत विश्व का सबसे बड़ा और सुलझा लोकतंत्रिक देशों के लिस्ट में शुमार है . भारत जैसे विविधताओं  वाले देश को उन्ही के विचारों ने एक सूत्र में बांधा है.  और सभी वर्ग के लोगों के लिए चाहे वो किसी भी धर्म या समुदाय से सम्बन्ध रखते हैं उनके लिए समान अवसर के मार्ग को प्रशस्त्र किये हैं । परंतु आज लोग उनके विचारों से इतर हो उनमे भी कमियाँ ढूंढ रहे हैं ।

भारत में षड्यंत्रकारी और विभाजनकारी ताकतों द्वारा अम्बेडकरवादी विचारों को दमन करने की ये जो नाकाम कोशिशें की जा रही हैं इसके परिणाम से संभवतः वो खुद भी अनजान हैं. और जानें-अनजाने में देशवासियों को एक-दूसरे से नफरत करने को मजबूर कर अपना राजनैतिक लाभ ढूंढ रहे हैं, तो मैं उन्हें सावधान करना चाहूँगा की ये अवसरवादी राजनीति का मोह त्याग कर जनकल्याण की ओर अग्रसर होने का समय है क्योंकि राजनीति में केवल जनकल्याण ही ज़रूरी है और यही  सत्य भी, लेकिन ऐसा करने में शायद ही कोई सफल रहा है।

अगर कुछ वर्ग आज आरक्षण की समीक्षा चाहते हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं पर ये आपसी सहयोग से ही संभव है । सर्वोच्चय न्यायालय का सांसदीय अधिकार क्षेत्र में बार बार हस्तक्षेप करना कितना उचित व अनुचित है! इस बात को दरकिनार कर सरकार की मंशा पर विचार करना जरूरी है, पुनर्विचार याचिका दायर करने में हुई देरी का ही नतीजा है की दलितों ने भारत बंद बुलाया था ।

आज तक अपने निजी स्वार्थ के लिए ही भारत बंद बुलाया जाता है चाहे वो आम जनता क द्वारा हो या फिर किसी राजनीतिक दल द्वारा, पर सवर्णों द्वारा किया गया भारत बंद मेरे लिए ऐसा पहला अवसर था जिसे दखेकर ऐसा लगा कि ये बंदी कम और शक्तिप्रदर्शन ज्यादा था हालाँकि उनकी मांगो पर विचार किया जाये तो कहीं न कहीं उनकी मांगे जायज थी लेकिन मेरे हिसाब से मार्ग दूसरा होना चाहिए था ।

  • अगर सरकार बाबा साहब के विचारों की रक्षा हेतु तत्पर होती तो शायद एसी नौबत ही नहीं आती. वो ख़ुद ही इसमें जितना संभव होता संसोधन कर उच्य वर्ग और दलितों के बीच की इस दुरी को सदा के लिए ख़त्म कर चुकी होती । सरकार अगर वाकई में दलितों के हितों की रक्षा करना चाहती है तो उसे कुछ दमनकारी व विभाजक तत्वों को राजनीति से दूर करने की आवश्यता है और साथ ही साथ दलित उत्पीड़न के मामलों पर भी गंभीर होने की जरूरत है. मुझे लगता है की दलितों के लिए बनाये गए कानून में वर्तमान समय को देखते हुए संसोधन की ज़रूरत है । समाज को अम्बेडकर की स्मारकों की आवश्यकता नहीं बल्कि अम्बेडकरवादी विचारों की प्रगढ़ता वाली सरकार की आवश्यकता है ।

अम्बेडकर किसके हैं?

अंत में लेख के मूल सवाल पर बात करते हैं की अम्बेडकर किसके हैं? और उनकी ज़रूरत किसे है ? तो अम्बेडकर उन सभी के हैं जो शोषित और बहिष्कृत समाज से सम्बन्ध रखते हैं । समाज में जिन्हें हीन भावना से देखा जाता है और हां वे उनके तो बिल्कुल नहीं हैं जो दलित समाज का प्रतिनिधित्व करने का ढोंग रच रहे है और सरकार में रह कर भी अपनी राजनैतिक लाभ देखते हैं । दलितों को अपने-अपने मतों का हर चुनाव में अपनी हितों के संरक्षण हेतु प्रबलता व बुद्धिमता से प्रयोग करने की जरुरत है।

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By: Ankush Prakash

 

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