विचार

ब्राह्मण और दलित से पहले हम एक इंसान हैं

दो साल पहले एक किताब हाथ लगा था नाम था वाइट टाइगर जो अरबिंद अडिग के द्वारा लिखा गया है।अंग्रेजी साहित्य की सबसे प्रतिष्ठित मैन बुकर पुरस्कार यह किताब जीत चूका है । बिहार की पृष्ठभूमि पर लिखी गई ये किताब बिहार के एक जाति जिसको हम भूमिहार ब्राह्मण कहते हैं उसपर काफी कटाक्ष करते दिखता है।शायद सत्य के करीब भी हो ।

किताब पढ़ते पढ़ते भुमिहार ब्राह्मण के प्रति एक पूर्वाग्रह मन में बन गया अरबिंद अडिग की लेखनी इतनी तगड़ी है की तमिलनाडु के होते हुए भी उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ा है बिहार के पृष्ठभूमि को ज्यों का त्यों गढ़ने में । खैर असली बात पर आता हूँ।विशाल भाई के बहन के शादी में गया था।बड़ी अजीब बात हुई और शायद ऐसा की मेरे मन और मस्तिष्क पर बहुत गहरा छाप पड़ गया।जो सिखने को मिला वो असाधारण था और हमेशा के लिए चिरस्मरणीय यादों में शामिल हो गया।

पूरा कहानी बताता हूँ।विशाल भाई भूमिहार ब्राह्मण परिवार से आते हैं हमारे यहाँ यानी की बिहार में इनके बारे में तरह-तरह की भ्रांतियाँ प्रचलित है और ऊपर से वाइट टाइगर का डोज।हमारे यहाँ लोग सोचते हैं की ग्रामीण पृष्ठभूमि के जातिगत लड़ाई का मूल कारण ये लोग ही रहे हैं ।

जहाँ इनकी जनसंख्या नही है वो जगह थोड़ा जातिगत लड़ाई में शांत रहता है।बिहार में ज्यादातर वामपंथी लोगो ने इनके खिलाफ बहुत कुछ लिखा।आपको बाथे,मथानी टोला,सियाल चक बघोरा जनसंहार अगर याद हो तो आप समझ सकते हैं की जातिगत घृणा में हमारा बिहार किस तरह तप रहा था ।

और टारगेट पर एक जाति सबसे ज्यादा थी और वो थें भूमिहार ब्राह्मण।बहुत कुछ लिखे गए थें यहाँ की पृष्ठभूमी पर। आपको ब्रह्मेश्वर मुखिया याद हैं जिन्होंने भूमिहारो पर हो रहे वामपंथियों के हमले से बचने के लिए रणवीर सेना का गठन किया था। चलिए अपनी बात पर वापस आता हूँ।दरअसल शाम को बारात आने वाली थी हमलोग थोड़े व्यस्त थें सीढ़ियों से निचे उतरते वक़्त हमने देखा की एक गन्दे कपड़े में एक दलित परिवार की लड़की सीढ़ी के पास ही अपने माँ के साथ आई थी।पता चला बिच्छु ने डंक मार दिया है ।

मैंने देखा की विशाल के चाचा जी एक विशेष प्रकार की दवाई रखते हैं जो डंक मारने वाले जगह पर लगाया जा रहा था।दवा थोड़ा जलनशील था उस छोटी सी लड़की को जोर से दर्द हुआ।विशाल भाई के चाचाजी ने एकदम अपनापन भरे आवाज़ में कहा की-"बस हो गया बेटी,बस बस थोड़ा सा और,लो अब छु मन्तर हो जाएगा।"

अपनापन ऐसा था की "बेटी" शब्द कानों में बार-बार गूंज रहा था।मैंने विशाल भाई को कहा की भाई ये देखो ये रही हमारी सामाजिक ताना बाना।यही है वसुधैव कुटुम्बकम्।काश की कभी थोड़ा भी वामपंथियों को ये दिख जाता।मैं नहीं जानता की कितने ब्राह्मणों,राजपूतो,कायस्थों और भूमिहार ब्राह्मणों ने बिहार में कितने दलितों का शोषण किया ।

लेकिन मैंने जो देखा वो लंबे समय तक यादो में रहेगा।बहूत ही लंबे समय तक मुझे नहीं पता की विशाल भाई के चाचा के जैसे कितने लोग हैं पर करुणा तो सबके दिल में है।प्रेम सबके दिल में है और कभी-कभी ये सारी सीमाएं लाँघ जाती है।जैसे माता सबरी और विदुर के पत्नी के समय लांघा था । सिखने को ये मिला की समाज कितना भी पूर्वाग्रह(prejudice) आपको दे चाहे ये जाति के बारे में हो या धर्म के बारे में बस एक बार हम किसी शख्स को उसके खूबियों से देखें।उसके आत्मा में झांके।

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