विचार

आखिर कभी तो सुधरेगी भारतीय रेलवे

भारतीय ट्रेनें समय से चल रही हैं। पटरियाँ काफी दुरूस्त हो गई हैं। बिहार से दिल्ली जानें में मात्र पाँच घंटे लगते हैं। रेलवे स्टेशन शॉपिंग माल की तरह चमक रहे हैं। सारे स्टेशन पर अनलिमिटेड फ्री वाईफाई है। यात्रा से कुछ घंटे पहले भी टिकट आसानी से मिल जा रहा है। रेलवे के राजस्व में जबर्दस्त इजाफा हुआ है। मुंबई दिल्ली कोलकता चेन्नई बेंगलुरू बुलेन ट्रेन द्वारा एक दूसरे से जुड़ गए हैं। भारतीय रेलवे दुनिया की नंबर एक रेलवे बन गई है'।

भारतीय रेलवे को लेकर मेरे जैसे हजारों लाखों लोग ऐसे हीं सपनें देखते हैं जिसका वास्तविकता से करोड़ो किलोमीटर दूर तक कोई लेना देना नहीं होता। लेकिन फिर भी उम्मीद होती है कि कभी न कभी तो यह सपना पूरा होगा। कहा जाता है ' सिर्फ सपनेंं देखों नहीं,उसे पूरा करनें निकल पड़ो। निकलते तो सब हैं लेकिन मंजिल तक पहुँचाने वाली हमारी प्यारी रेलवे सपनों को कुचलते चली जाती है।

फिर भी सोंचता हूँ शायद हमारी पीढ़ी इसको न देख पाये लेकिन आनेवाला जेनरेशन तो देख सकेगा। लेकिन दिल कहता है ' ना बाबा ना, भारत में इस तरह का सोंचना एक जुर्म से कम नहीं है'। यहाँ समय पर चलना तो मूर्खता का प्रतीक है,क्योंकि सबके सब लेट जो हैं। ट्रेन के बाथरूम में बिना इमरजेंसी के भी लोग कूल्हे टिकाये बैठे हों तो समझिए भारतीय रेल के वास्तविकता में आप घुस रहे हैं। एक तरफ से सड़कें इतनी तेजी से बन रही है,और दूसरी तरफ पटरियाँ उतनीं हीं तेजी से सिकुड़ रही है। दरभंगा-मुजफ्फरपुर से चलनें वाली सबसे फास्ट ट्रेन अगर समय पर चले तो 18 से 20 घंटे लेती है.. जबकि सड़क मार्ग से 12-13 घंटे बहुत है।

एक फिल्मी गानें के बोल पर रेल की कहानी है,दो लाइन की.. नहीं,ये हो नहीं सकता कि ट्रेन में भीड़ कम हो जाए, चढ़नें से पहले तेरी ट्रेन छूट जाए। सप्तक्रांति सुपरफास्ट एक्सप्रेस मुजफ्फरपुर से मोतिहारी नरकटियागंज,गोरखपुर होते हुए दिल्ली जाती है। जब मुजफ्फरपुर जंक्शन पर यह यार्ड से आकर प्लेटफार्म पर खड़ी होती है,तो ऐसे भगदड़ मचता है,मानों भूकंप आ गया हो।

भारतीय रेलवे पुलिस बल भी जनरल बोगी के पास अपनी जगह ले चुका होता है। लाठी खाकर,भीड़ में तगड़ा धक्कामुक्की करनें का साहस अगर आप में हैं,तो आप सप्तक्रांति जैसे ट्रेन के जनरल बोगी में चढ़ सकते हैं।जनरल इसलिए ज्यादा वैल्यू वाला हो गया है क्योंकि रिजर्वेशन में सीट मिलना और दिन में तारे देखना बराबर हो गया है। देश का भविष्य यानि युवाओं के मजबूत कंधे कहीं और काम आए न आए..

ट्रेन में चढ़नें के लिए काम जरूर आ जाते हैं.जिसे हम स्पेशल टैलेंट कह सकते हैं। बचे बुजुर्ग,तो आजकल ट्रेन का फर्श किसी वृद्धाश्रम से कम नहीं होता। अगर आप एकदिन तक अपना ट्वायलेट बाथरूम रोक सकते हैं तो बेझिझक चढ़ जाइए भारतीय रेल में, जो आपके इस टैलेंट का हमेशा से स्वागत करती है। कभी ट्रेनों की ब्रेक बाइंडिंग हो जाती है लेकिन स्टाफ को पता तक नहीं चलता।

और पता भी तब चलता है जब पहियों के पास चिंगारी उठनें लगती है और यात्री कूदनें लगते हैं। कभी बिना गार्ड के हीं ट्रेन रवाना हो जाती है,तो कभी पटरी खोलकर मरम्मतकर्मी आराम फरमानें चले जाते हैं। रेलवे की ऐसी हालत देखकर समझ में आता है कि पर्यटन की संभावनाएँ यहाँ भी कम नहीं है। दुनियावालों, आओ और आनंद लो भारतीय रेल का।

बातें मत हांकिए अपनी सोंच बदलिए साहब

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