राजनीति विचार

कर्नाटक चुनाव: बीजेपी या कांग्रेस आखिर किसने की लोकतंत्र का हत्या ?

कर्नाटक के चुनावी परिणाम आने के बाद से ही पूरे देश की निगाहें कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद पर टिकी हुई है । बीजेपी हो या कांग्रेस सत्ता पाने के जोर आजमाइस में दोनों ही एक दुसरे को पीछे छोर दिया । कांग्रेस तो इतनी ताकत और निष्ठा के साथ इस कार्य को किया कि खुद के पास 78 विधायक होने क बावजूद भी 37 विधायक वाले जेडीएस को मुख्यमंत्री पद सौंप दिया इतिहास को भी देखा जाये तो उनके लिए ये कोई बड़ी बात नहीं हैं वो ऐसी निष्ठा पहले भी दिखा चुकी है ।

कांग्रेस का जेडीएस के प्रति निष्ठावान होना अपाच्य है क्योँ की ये वही जेडीएस है जिस पर स्वमं कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि यह पार्टी बीजेपी पार्ट 2 है लेकिन जब आज कांग्रेस को अपना भविष्य राजनीति गलियारे में डूबता दिख रहा है तो उसने लोकतंत्र में एक बार फिर से अनैतिक राजनीतिक की सौदेबाजी कर जेडीएस के साथ सरकार बनाई है ।

कर्नाटक चुनाव के बाद से ही कांग्रेस द्वारा लगातार कहा जा रहा था की इस चुनाव में लोकतंत्र की हत्या हो रही है लेकिन कर्नाटक के पूरे राजनीतिक घटनाक्रम को देखकर वो समय भी याद आता है जब देश के प्रधानमंत्री इंद्रा गाँधी और राजीव गांधी हुआ करते थे । लोकतंत्र की हत्या तो उस दिन भी हुई थी जब इंद्रा गांधी ने आपातकाल घोषित किया था, और देश के सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं को बंद कर दिया था.

उसके बाद इसी इतिहास दुबारा दोहराया गया जब वी पी सिंह के सरकार को गिड़ाने के लिए कांग्रेस ने चौ. चरण सिंह के पार्टी को अपना समर्थन दिया था लोकतंत्र की हत्या तो उस वक़्त भी हुई थी । उसके बाद लोकतंत्र की हत्या तभी हत्या ही हुई थी जब राजीव गांधी ने ही चंद्र शेखर की सरकार गिरवाई थी । अगर आज के संदर्भ में कांग्रेस की भाषा की बाद कि जाए तो उस समय लोकतंत्र की हत्या तो कांग्रेस ने भी की ।

लेकिन सवाल उठता है की इस तरह के माहौल तैयार करके क्या कांग्रेस इस चीज़ को झुठलापायेगी . कांग्रेस को कर्नाटक की जनता ने 78 सीट दी है तो वही बीजेपी को 104 और जेडीएस को 37 फिर भी सत्ता के लिए बीजेपी पार्ट 2 से गठबंधन करने में कोई हिचकिचाहट नहीं हुई । 2014 के बाद भी चुनाव हुआ कांग्रेस और विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने भारत की चुनाव प्रणाली पर सवाल दागे है । लेकिन सोचने का विषय तब हो जाता है जब उसी चुनाव प्रणाली और उसी चुनाव EVM मशीन से पंजाब और दिल्ली में चुनाव होता है और दोनों जगह जब गैर भाजपाई सरकार बनती है तो यहाँ सवाल उठाने वाला कोई नहीं होता है ।

उसी तरह के अदालत के फ़ैसले पर भी होता है अगर अदालत बीजेपी के विरोध में फैसला सुनाती है तो ठीक है अन्यथा उसमें भी पक्षपात के आरोप लगाये जाते हैं , यहाँ तक की सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश पर महाभियोग तक का प्रयास !

देश में लोकतांत्रिक राजनीतिक पार्टीयों का काम केवल सत्ता में बैठकर राज करना ही नही होता बल्कि जब देश की जनता उस पार्टी को विपक्ष की कुर्सी पर बैठाए तो उस कुर्सी पर बैठकर देश के हित के लिए विपक्षी धर्म निभाना भी होता है । देश की सबसे पुरानी राजनीतिक दल कांग्रेस हमेशा से ही इस मामले में दूर दूर तक फिट नहीं बैठती है . लेकिन जब यही कांग्रेस पार्टी इस तरीके से देश की लोकतांत्रिक व्यस्था और संस्थाओं पर अपने अनुरूप पक्षपात करने का आरोप लगाएगी तो यह उसके लिए एक चिंता का विषय है ।

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