ब्लॉग: नब्ज पकड़िये...चेक कीजिये कहीं आपके अंदर का पत्रकार मर तो नहीं रहा
विचार

नब्ज पकड़िये...चेक कीजिये कहीं आपके अंदर का पत्रकार मर तो नहीं रहा

आज के दौर में किसी की साख सबसे ज्यादा दांव पर लगी है तो वो हैं पत्रकार. और इसके जिम्मेदार भी खुद पत्रकार ही हैं. दिन-ब-दिन पत्रकारिता का गिरता स्तर पत्रकार की विश्वसनीयता कम कर रही है. जिस तरह से पत्रकार अपने मूल सिद्धांतो को छोड़ चाटुकारिता की राह पर निकल पड़े हैं उसे देख ये अनुमान लगाना भी भयाभह लगता है की पत्रकारिता का भविष्य क्या होगा !

आज का पत्रकार नीति और सिद्धांत विहीन हो गया है. चंद पैसों या वक्तिगत फायदों के लिए पत्रकार जिस रफ़्तार से अपनी नीतिगत मूल्यों से समझौता कर सत्ता की चौखट पर हाजरी लगा रहा है वो अपने आप में चिंत्निए है, और समाज के लिए दयनीय. आप कहेंगे हर पत्रकार ऐसा थोड़े ही है! कुछ पत्रकार बड़ी ईमानदारी से अपनी पत्रकारिता धर्म निभा रहे हैं. मैं आपकी बातों से सहमत हूँ कुछ एक पत्रकार हैं जो आज के दौर में भी अच्छी पत्रकारिता कर रहे हैं. वो अपने मूल्यों पर खड़े उतर रहे हैं. लेकिन, उनकी संख्या कम है. ज्यादातर पत्रकार या मीडिया संस्थान पत्रकारिता नहीं चाटुकारिता और टीआरपी का गेम खेल रहे हैं.

उदाहरण के लिए, भारत एक गरीब देश है इसका क्या मतलब समझेंगे आप ? इसका मतलब ये तो नहीं की भारत में अमीर है ही नही! दुनिया के टॉप 10 अमीरों की लिस्ट में भारतीय हैं. फिर भी भारत को गरीब देश कहा जाता है न ! क्योंकि भारत का औसतन आबादी गरीब है . ठीक वैसे ही पत्रकारिता में भी है. यहाँ भी अच्छी पत्रकारिता करने वाले मौजूद है जो अपने मूल सिद्धांतो के तहत पत्रकारिता करते हैं. लेकिन, उनकी आबादी बहुत कम है.

इस लेख में आगे बढ़ने से पहले आपको पत्रकारिता की कुछ मुख्य बिंदुओं (सिद्धांत) को जानना चाहिए. एक पत्रकार सत्ता और सिस्टम से बेख़ौफ़ और बेबाक सवाल पूछने के जनता का प्रतिनिधित्व करता है. यही उसकी जिम्मेदारी भी है और कर्तव्य भी कि वो सरकार और सिस्टम की नीति पर सवाल करे, अगर उसमे कुछ कमी है तो उसको चिन्हित करे. सत्ता के हुक्मरानों को समय-समय पर यह एहसास दिलाते रहे कि अगर आपने कुछ झोलझाल किया तो हम यहाँ चौकन्नें हैं.

पत्रकार की ये भी जिम्मेदारी होती है की आप जिस जनता का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं उसकी परेशानीयों को सत्ता और सिस्टम्स तक पहुंचाए. उसकी आवाज बने. इसके साथ ही सरकार और सिस्टम की कोई नीति उनके हित में हो तो उन्हें आसान भाषा या तरीकों से बताएं ताकि वो उनका लाभ उठा सके.

आज के दौर में अधिकतर पत्रकारों का सत्ता से सवाल इतना लचर और कमजोर रहता है कि खुद सत्ताधीस शर्मा जाते हैं. एक-दो बार तो प्रधानमंत्री ने ऐसे सवालों पर खुद फिरकी ली है.

मेरे हिसाब एक पत्रकार को सत्ताधीशों की तारीफ़ करने बजाय जनता की हित में बार-बार लगातार सवाल करते रहना चाहिए. क्योंकि तारीफ़ करना पार्टी के PR डिपार्टमेंट का काम है. अगर पत्रकार ये काम करने लग जाए तो PR का क्या काम! और याद रखिए जिस काम के लिए सत्ताधारी पार्टियाँ अपनी तारीफ़ करवाना चाहती है वो काम उनकी जिम्मेदारी भी है और कर्तव्य भी. अब बताइए भला कर्तव्य के लिए कैसी तारीफ़!

हिन्दू-मुस्लिम नही एक हिंदुस्तानी बन कर सोचियेगा, जो नसीरुद्दीन शाह ने कहा क्या वो सच नही है ?

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Praful Shandilya
praful shandilya is a journalist, columnist and founder of "The Nation First"
http://www.thenationfirst.com

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