वेदांती महाराज | yogi adityanath | narendra modi
देश विचार

वेदांती महाराज कोई नए विधाता नहीं हैं, इन आंखों ने बहुत देखे हैं मंदिर बनाने वाले

केंद्र में मोदी सरकार है तो उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार है। इसके बावजूद भी राम मंदिर का निर्माण नहीं हो पाया . केंद्र में मोदी सरकार को आए तो 4 साल से ज्यादा हो गया है लेकिन राम मंदिर बनवाने के नाम पर हर बार केवल बयानबाजी ही होती रही है . मंदिर मस्जिद की राजनीति में फायदा सिर्फ सियासत के पहरेदार उठाते हैं जैसे ही चुनावी दौर शुरु होता है सभी पार्टियां राम मंदिर और बाबरी मस्जिद का राग अलापने लगती है और जैसे ही चुनाव खत्म होता है ये पहरेदार राम मंदिर को भुल जाते हैं .

अब राम मंदिर का बुखार वेदांती महाराज को चढ़ा है

ऐसा पहली बार नहीं है ये देश में दशकों से होता चला आ रहा है। चुनाव आते हैं राम मंदिर की चिंता सताने लगता हैं लेकिन इस बार राम मंदिर का बुखार वेदांती महाराज को चढ़ा है या यूं कहें की इस बार इस मुद्दे को उठाने वाले का चेहरा बदल गया है, क्योंकि जिस तरह से मुस्लिम पक्ष ने इसे खारिज किया है, उससे तो यही सामने आता है . वेदांती महाराज के दावों का वजूद खतरे में है,

तो क्या यह महज़ चुनावी स्टंट है, मौजूदा राजनीति में राम मंदिर के मुद्दे पर दो नाम अहम हो जाते हैं, पहला पीएम नरेंद्र मोदी और दूसरा योगी आदित्यनाथ, ये राम मंदिर का वो दौर है जब नेता राम मंदिर विवाद के नाम पर सत्ता या संवैधानिक पदों पर जा पहुंचे हैं लेकिन अब पीएम मोदी के बयानों में मंदिर का ज़िक्र नहीं मिलता और सीएम योगी में भी राम मंदिर बनाने की वो जिज्ञासा नहीं दिखाई देती है, जो सीएम बनने से पहले दिखाई देती थी .

वेदांती महाराज का ये बयान सियासत के लिए एक मुफीद बयान है, जिससे लगता है कि इस मसले को फिर से हवा मिलेगी, बयानबाजियों का दौर एक बार फिर से होगा और देश फिर से मंदिर मस्जिद की चिंता में लग जाएगा। अब तो ऐसा प्रतीत होने लगा है की यह मसला हमेसा जिंदा रहेगा और मंदिर के नाम पर राजनीतिक फायदा राजनीति के शेख उठाते रहेंगे क्योंकि ऐसी बयानबाजियों का अपना एक इतिहास हैं, इस देश में सरकारें आई और चली गईं लेकिन सच्चाई यही रही कि कोई भी सरकार मंदिर नहीं बना पाई .

अयोध्या का रास्ता शायद भूल गए नरेंद्र मोदी

मोदी सरकार को आए हुए भी चार साल से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन मोदी जी एक बार भी अयोध्या नहीं आए पीएम मोदी बनारस से लेकर मगहर तक चले गए दुनिया भर में घूम-घूम कर मंदिर, मस्जिद और मज़ारों पर जा रहे हैं लेकिन अयोध्या का रास्ता शायद प्रधानमंत्री भूल गए . 2014 में प्रधानमंत्री मोदी का हिंदुत्व का चेहरा राम मंदिर निर्माण के लिए  एक आशा की किरण लेकर आया था, लेकिन सरकार के कार्यकाल को 5 साल होने को आए हैं लेेकिन अभी तक राम मंदिर का मुद्दा महज एक मुद्दा ही है।

चुनाव एक बार फिर से सर पर आ गया है अब पीएम मोदी के बयानों में भी राम मंदिर का नाम ज्यादा नहीं सुनाई दिया और मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद एक बार भी अयोध्या नहीं पहुंचे। हालांकि ये पूरा देश जानता है अयोध्या और भारतीय जनता पार्टी का राजनीतिक संबंध भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है . उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि देश भर में बीजेपी को राजनीतिक पहचान दिलाने में अयोध्या और राम मंदिर ने अहम भूमिका निभाई है . चार साल से बीजेपी अयोध्या के नाम पर सुप्रीम कोर्ट का नाम लेकर ख़ुद का बचाव कर जाती है .

कहाँ गया वो योगी का कटीला तेवर ?

एक दौर था जब योगी आदित्यनाथ सीएम नहीं बने थे, यूपी के विधानसभा चुनावों में योगी आदित्यनाथ ने राम मंदिर के नाम पर जमकर प्रचार किया था . जून 2016 में उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा था, ‘क्या ऐसी कोई ताकत है जो मंदिर निर्माण को रोक सके? जब वे बाबरी मस्जिद का ध्वंस नहीं रोक सके तो वे मंदिर निर्माण को कैसे रोक पाएंगे . चुनावों से पहले ऐसे तेवर योगी आदित्यनाथ की पहचान थी लेकिन आज योगी आदित्यनाथ भी अयोध्या पर बदले मिजाज़ में बात किया करते हैं अब योगी आदित्यनाथ संविधान, कानून और मर्यादा का नाम लेकर राम मंदिर से बीजेपी का बचाव कर जाते हैं .

हालांकि बीजेपी का वो वादा आज भी देश को याद है, जिसमें 2014 के चुनावों से पहले बीजेपी ने कहा था अगर पूर्ण बहुमत वाली सरकार आई तो बीजेपी राम मंदिर जरूर बनवाएगी। लेकिन मोदी सरकार के पहले 4 साल में विकास के नारों के बाद, राम मंदिर पर बयानबाजी के सिवा कुछ हासिल नहीं हुआ....

इस देश को कुछ नहीं मिला लेकिन सियासत ने बहुत कुछ कमाया है

छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में कार सेवकों ने बाबरी मस्जिद गिराई थी . बाबरी मस्जिद ढहाए जाने को करीब 26 बरस पूरे होने वाले हैं, इन 26 सालों में देश में बहुत कुछ बदल गया वक्त बेवक्त भारतीय राजनीति में राम मंदिर का मुद्दा गरमाता रहा लेकिन राम मंदिर का हल नहीं निकला। आपसी सहमती से मंदिर को बनाने की बात होती रही है . सुप्रीम कोर्ट भी इन्हीं कोशिशों में लगी रही की मंदिर मस्जिद का ये विवाद आपसी भाई चारे से निपटा लिया जाए .

दशकों से चले आ रहे राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद का मुद्दा दोनों पक्ष सुलझाने की कोशिशें भी करते रहे, लेकिन हल नहीं निकल पाया। कोर्ट ने अयोध्या विवाद को संवेदनशील और भावनात्मक मुद्दा बताते हुए नए सिरे से बातचीत करने को कहा था। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होती रही,और दोनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट के बाहर आपसी बातचीत करने में लगे रहे, लेकिन राम मंदिर का हल नहीं निकला।

2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अयोध्या में विवादित जमीन का तीन पक्षों में बंटवारा कर दिया जाए। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील हुई और बाद में फैसले को रोक दिया गया। बीजेपी उम्मीद कर रही है कि शायद इस साल सुप्रीम कोर्ट का फैसला आए। बीजेपी का मिशन 2019 इस फैसले पर काफी हद तक निर्भर है लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी अयोध्या का हल नहीं निकल पाया है। मंदिर मस्जिद की इस लड़ाई में अयोध्या विकास को तरसती रही, और सियासतकार मंदिर और मस्जिद के नाम पर फायदा उठा रहे हैं।

                                                                                                                                    ByAhzaz Badar

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