कविता

आबरु

तेरी करुण कंद्रण से

दिल मेरा भी रोया था,

आंसू रक्त के माफिक

उस वक्त जब तेरे

आंखों से बहा था,

जब तेरी आबरु

तार तार हुआ

एक आग लगी थी

उस वक्त

मेरे दिल मे भी,

और मैं

जार जार रोया था ।

दरिंदगी की सारी हदें

पार कर दी थीं जब

उन दरिंकदो ने

ना जाने कुदरत भी

क्यों खामोश थी

ऐसे नाजुक सी हालात में

जब तेरा अभीमान

तार तार हुआ था,

अपने जिस्म की आग

मिटाने की खातिर

तेरे इश्क का गला घोंटा था,

हैरान था मैं उस वक्त

कुदरत का करिश्मा देख कर

जब निश्छल बदन को छू कर तेरी

ममता को झकझोरा था,

मेरे इश्क को ठूकराने वाले सुनो

मोतीयों के तरह बिखरे

तेरे आंसूओं को मैंने

सड़कों से बटोरा था,

जब रक्त से लथपथ परी थी

शरीर तुम्हारी, फिर भी

तेरे आशिकों नें

बेरहमी से झकझोरा था,

खंजर सा लगा था

मेरे दिल में

तेरी करुण कंद्रण को सुन कर

दिल मेरा भी रोया था ।

2,090 total views, 2 views today

Facebook Comments

One thought on “आबरु”

Leave a Reply