कविता

एक बूंद गिरा जो रक्त का

एक बूंद गिरा जो रक्त का

लाल हुआ ये अम्बर

छलक पड़ा आंखों से आंसू

देख भयावह मंजर

जंज़ीरों में जकड़ी थी वो

हुआ मलाल उसका

अपनी आहुति देने को

खड़ा था लाल उसका

बेदी सजी थी वीरों की

मिट्टी की तिलक लगा कर

बजे नगाड़े मैदां में

युद्ध का भीषण हुंकार हुआ

वक़्त की ललकार देख

दुश्मनों का समय ही

 उनका काल हुआ

जान गवाईं वीरों ने

तब मिली आजादी थी

जिसका उनहत्तर साल हुआ

एक बूंद गिरा जो रक्त का

अम्बर हमारा लाल हुआ ।

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