कविता

मेरी आरजू

एक आरजू थी

ऐ ज़िंदगी

कस कर गले लगता तुझे,

मुझे मालूम है

तू मुझसे खफा है, फिरभी

अपना होने का एहसास

दिलाता तुझे,

ऐ ज़िंदगी

कसकर गले लगता तुझे ।

हर वक़्त तू मेरे साथ

और मैं तेरे साथ रहूं,

तेरी ही आगोस में

मैं सोता हूँ,

शायद इसका एहसास

दिलाता तुझे,

ऐ ज़िंदगी

कसकर गले लगता तुझे ।

रुसवाईयों का दौर

मिटा कर

दुल्हन की तरह

सजता तुझे,

वक़्त की नजाकत को देख

कभी खुद से

मिलता तुझे,

ऐ ज़िंदगी

कसकर गले लगता तुझे ।

मेरी साँसों की डोर

तुझ से ही बंधी है

गैरों की जगह

अपने दिल मे

बसता तुझे,

ऐ ज़िंदगी

कसकर गले लगता तुझे ।

तेरी तम्मनाओं का

ख्याल कर लोरियों तले

सुलाता तुझे,

जब सुबह की धूप खिलती

प्यार के अल्फाजों से

जगाता तुझे,

एक आरजू थी

ऐ ज़िंदगी

कसकर गले लगाता तुझे ।

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