कविता

आओ बैठ लें कुछ देर

आओ बैठ लें कुछ देर,
आओ निर्विचार हो लें।
भुला दें कुछ देर खुद को,
जगत को;
यहाँ की आपाधापी को।
कुछ देर खो जाएँ,
धूप में;कुदरती प्रेम में,
फिर यह समय मिले न मिले।
आओ बैठ लें कुछ देर,
आओ निर्विचार हो लें।
भावों का यह सुंदर फूल,
फिर खिले न खिले।
आओ बैठ लें कुछ देर,
आओ निर्विचार हो लें।
                                 देवानंद कुमार.

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