कविता

फरेबी

धुंध.. पर गई यादों पे
खामोश हो गई वो
अपने हीं वादों पे,
जब दामन थाम दूसरे की
निकली वो
शक हुआ था मुझे
उसके इरादों पे,
शक्ल मासूम था
दिल मे लिये थी खंजर
नज़रें थीं झुकी हुई
मेरे सपनों को तोड़ रही थी वो
काफी भयावह था वो मंजर,
फरेब मानों रियासत में मिली हो
दर्द देने की कला मानो
विरासत में मिली हो
ये पहचान उसका,
फरेबी का ताज पहना दो उन्हें
ये सम्मान उनका है,
हम तो गैरों का भी
खुद से ज़्यादा ख्याल रखते हैं
ऐसे फरेबियों के लिए भी
दफनाए अपने दिल मे
हज़ारो सवाल रखते हैं,
ये जो चींटियों की तरह
रेंग रहें हैं, उनके अपने जात वाले
इसका संदेशा भेजवा दो
क्योंकि ये खानदान उनका है ।

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