कविता

तकदीर

लो टकरा हीं गई तकदीर तुम्हारी
मेरे तकदीर की लकीरों से
तन्हा बैठ कब तक इबादत करोगी
इन पत्थर के फकीरों से

इनके आशीर्वाद तो खुद हीं तन्हा हैं
जो बरसते केवल अमीरों के दिल पे
आ खुद से गुफ्तगू कर मिटा दें
अपने फासलों को
तुम समझती हो, मैं समझता हूँ
मिला ही क्या है इन पत्थर के फकीरों से,

इनके आशीर्वाद में अब वो ताकत नही
जो मिटा दे हमारे फासलों को
दर दर भटकते ये खुद ही
दीमक खा गई है इनके हौसलों को

एक जमाना हुआ करता था
जब मेरा विश्वास भी अडिग था
इन पत्थर के फकीरों पे
अब तो खुद ही डूबने लगी है नैया इनकी
प्रेम के जालसाजों से

आ खुद हीं ढूंढ ले एक दूसरे को खुद में
तुम मेरे आंसू पोछ दो
मैं तेरी सिसकियां रोक दूं
अब आस नहीं मुझे इन पत्थर के फकीरों से
लो टकरा ही गई तकदीर तुम्हारी
मेरे तकदीर की लकीरों से।

 

यह भी पढ़ें:

एहसास तुझे भी है मुझे भी

कविता: सवाल

कविता: गुड़िया

कविता: संवर जाता मैं !

कविता: जलता रहा मैं रात भर

कविता: कतरा कतरा खुन का बह जाने दे

कहानी : पल भर का सच्चा प्यार

कहानी: नकाबपोश

कहानी: वीरान जिंदगी और हवस

कविता: तेरे प्यार का सुर लेकर संगीत बनाएंगे

 

ऐसी ही कविता-कहानियों का आनंद लेने  के लिए  हमसे  facebook और twitter पर जुड़े 

 

1,939 total views, 3 views today

Facebook Comments

Leave a Reply