कविता

तुम बहुत हसीन हो ऐ कविता

तुम बहुत हसीन हो ऐ कविता
जो जज्बातों को जगती हो ।
वर्षों से धूमिल पड़ी यादों को
शब्दो में सजाती हो,
कभी संजोती तुम
उन हसीन लम्हों को,
कभी सजाती तुम
उन नमकीन लम्हों को,
याद दिला कर वादों का
उनका एहसास दिलाती हो,
तुम बहुत हसीन हो ऐ कविता
जो जज्बातों को जागती हो ।
कभी छलकाती
आंखों से आंसू,
कभी दर्द
बयां कराती हो,
दूर बैठे प्रेयतम को भी
प्रेयसी के पास बुलाती हो,
जब टूट जाता है दिल
आशिकों का इश्क़ में
फिर तुम उनके लबों पर
शायरी बन छा जाती हो,
रूठ जाता जब अपना कोई
तो उसे मानती हो,
गम का गला घोंट तुम
खुशियों को लहराती हो,
थक जाता है जब
मानव श्रृंखला
तब तुम उन्हें
लोड़ी तले सुलाती हो,
तुम बहुत हसीन हो ऐ कविता
जो जज्बातों को जागती हो ।

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