कविता

तुम भी तन्हा मैं भी तन्हा

शेष नहीं अब ज़िंदगी मे कुछ भी
तुम भी तन्हा मैं भी तन्हा

हां मिज़ाज थोड़ा तल्ख है, आज
थोड़ी सी रुसवाईयाँ भी हैं
सुहाना मौसम है, दस्तूर है
फिर भी, तुम भी तन्हा मैं भी तन्हा

दूर क्यों बैठी हो, पास आओ
नींद के दरिया में तुम
मीठे सपनों की एक दीपक हीं जलाओ
शायद यही मंजूर हो कुदरत को
फिर क्यों, तुम भी तन्हा मैं भी तन्हा

क्या तुझे ऐतबार नही
कुदरत की करिस्मओं पे
या फिर आज मिज़ाज तुम्हारा भी तल्ख है
इसी लिए तुम भी तन्हा में भी तन्हा

तुम कह क्यों नही देती
जो आग तुम्हारे सीने में लगी
एक दर्द है जो कुरेद रही
तुम्हारी जख्मों को,

चलो बात भी दो
इससे पहले नासूर बने जख्म तुम्हारे
शायद मेरे पास कोई मरहम हो
तुम्हारे हरे जख्मों के लिए
भर दूँ मैं वो रिक्ति
फिर शायद ना रहो
तुम भी तन्हा मैं भी तन्हा
शेष नही ज़िंदगी मे अब कुछ भी
तुम भी तन्हा मै भी तन्हा ।

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