राजनीति

सीबीआई विवाद के बाद अब आरबीआई से भिड़ी मोदी सरकार

आजकल केंद्र सरकार और देश के टॉप संगठनों के बीच सबकुछ सही नहीं चल रहा है. मुख्य जाँच एजेंसी सीबीआई में जारी विवाद में केंद्र सरकार के एंट्री की काफी आलोचना हुई थी. मामला अभी कोर्ट में है.  वहीं अब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और केन्द्र के वित मंत्रालय के बीच विवाद खुले तौर पर सामनें आ गया है.

वित्त मंत्री अरूण जेटली नें आरबीआई पर तीखा वार करते हुए कहा कि 2009 से 2014 के बीच बैंको नें जब आँख मूंदकर कर्ज दिया तो आरबीआई कहाँ थी. इसकी वजह से हीं एनपीए बढ़ा है. जेटली का बयान ऐसे समय में आया है जब केन्द्रीय बैंक की स्वायत्तता को लेकर केन्द्र और आरबीआई के विवाद नजर आ रहा है. कुछ दिन पहले आरबीआई के डिप्टी-गवर्नर विरल आचार्य ने कहा था कि आरबीआई के स्वतंत्रता की उपेक्षा करना बड़ा घातक साबित हो सकता है. उनका बयान, आरबीआई के नीतिगत रूख में नरमी और उसकी शक्तियों को कम करनें को लेकर केन्द्र के दबाव की ओर गंभीर इशारा था.

यूएस इंडिया स्ट्रेटेजिक पैसिफिक फोरम की ओर से आयोजित लीडरशिप समिट में भाषण देते हुए जेटली नें कहा कि "वैश्विक आर्थिक संकट के बाद अर्थव्यवस्था को कृत्रिम रूप से पटरी पर लानें के लिए बैंको को अधिक से अधिक कर्ज देनें को कहा गया. इस दौरान बैंकों नें भी दिल खोलकर बिना किसी पर्याप्त गारंटी के कर्ज दिया. 2008 से 2014 के बीच तत्कालीन सरकार नें बैंको को अधिक से अधिक कर्ज देनें को कहा जिससे एक साल के अंदर कर्ज में 31% का इजाफा हुआ. जबकि औसत वृद्धि दर 14% रही".उन्होनें हालांकि आरबीआई केन्द्र विवाद पर कुछ भी नहीं कहा लेकिन इशारों हीं इशारों में आरबीआई पर वार किया

डिप्टी गवर्नर ने कहा आरबीआई को स्वतंत्र रखना जरूरी

डिप्टी गवर्नर नें मुंबई में कहा था कि सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों का सही तरीके से नियमन करनें के लिए आरबीआई को और शक्तियाँ देनें की जरूरत है. साथ हीं उन्होनें यह भी कहा कि व्यापक तौर पर आर्थिक स्थिरता के लिए आरबीआई को स्वतंत्र रखना जरूरी है. इससे पहले जेटली नें एकबार कहा था कि बैंक अंधाधुंध कर्ज देते हैं और आरोप मंत्रियों और राजनेताओं को झेलना पड़ता है जबकि निगरानीकर्ता आसानी से बच निकलते हैं.

उन्होंने कहा कि 'नोटबंदी कठिन कदम था लेकिन इससे हमें यह साफ करने में मदद मिली कि हमारा इरादा अर्थव्यवस्था को संगठित रूप देना था।' उनके अनुसार वर्ष 2014 में जब बीजेपी सरकार सत्ता में आई आयकर रिटर्न भरने वालों की संख्या 3.8 करोड़ थी। चार साल में यह संख्या बढ़कर 6.8 करोड़ पर पहुंच गई है। मुझे भरोसा है कि इस साल यह संख्या 7.5 से 7.6 करोड़ हो जाएगी जो लगभग दोगुना है। उन्होंने कहा कि जीएसटी के क्रियान्वयन के पहले साल में ही अप्रत्यक्ष करदाताओं की संख्या 74 प्रतिशत बढ़ी।

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