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मक्का मस्जिद विस्फोट में असीमानंद बरी, क्या सच में RSS और हिंदू विरोधी है कांग्रेस?

मक्का मस्जिद विस्फोट 18 मई 2007 को हैदराबाद के पुराने चारमीनार के नजदीक वुजूखाना के पास सेल फोन से जुड़े हुए पाइप बम के द्वारा किया गया था जिसमें 16 लोगों की मौत और 50 से ज्यादा लोग घायल हुए थें। विस्फोट के बाद पुलिस के साथ हुए स्थानीय झड़प में 5 लोग और मारे गए थें । इस विस्फोट के लिए IED का प्रयोग किया गया था जिसमें सिक्लोरोल और 60:40 के अनुपात में RDX और टीएनटी मौजूद था। इस ब्लास्ट को मक्का मस्जिद के खुले मैदान में सेल फोन के द्वारा किया गया।

जांच और आरोपी

अप्रैल 2010 में असीमानंद ने कोर्ट में अर्जी देकर कहा था कि शारीरिक और मानसिक रूप से दबाव डालकर मुझसे जुर्म कबूल करवाने की कोशिश की जा रही है।बाद में तत्कालिक राष्ट्रपति प्रतिभा देवी को लिखे चिट्ठी में असीमानंद ने आरोप लगाया कि उनको प्रताड़ित किया जा रहा है।
नवंबर 9, 2010 को सीबीआई के सामने इस बम ब्लास्ट के मुख्य आरोपी असीमानंद ने मक्का मस्जिद विस्फोट में अपनी संलिप्तता स्वीकार की थी यहां बताते चलें कि असीमानंद का नाम समझौता,मालेगांव और अजमेर शरीफ विस्फोट में भी आया था। मार्च 2011 में असीमानंद ने यह कहा कि एटीएस ने उन पर दबाव डाला था इसीलिए उन्होंने सीबीआई के सामने मक्का मस्जिद बम विस्फोट में अपनी संलिप्तता बताई थी।

क्या कहते हैं दुनिया के बड़े थिंक टैंक

भारत की थिंक टैंक की बात की जाए तो अग्रणी थिंक टैंक इंस्टिट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस(IDSA) ने इस विस्फोट के पीछे हुजी(HUZI) अर्थात हरकत-उल-जिहाद-अल इस्लामी की संलिप्तता जाहिर की थी अमेरिका के शोध समूह नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर(एनसीटीसी) ने भी यूनाइटेड स्टेट सीनेट में विस्फोट में हूजी का शामिल होना बताया था ।
जिसे तत्कालिक सीबीआई की टीम ने खारिज किया था, आतंकवाद पर साउथ एशिया में काम करने वाले अग्रणी शोध संस्थान साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल ने भी इस विस्फोट में हूजी की संलिप्तता बताई थी,इस पोर्टल ने विकर अहमद और अमजद को मुख्य दोषी बताया था।

कांग्रेस और बीजेपी में जांच को लेकर तकरार

 जांच को लेकर तत्कालिक तात्कालिक गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने RSS और BJP पर "हिंदू आतंकवाद" को बढ़ावा देने का आरोप लगाया था साथ ही इस विस्फोट को समझौता एक्सप्रेस विस्फोट और मालेगांव के साथ अजमेर शरीफ विस्फोट के साथ भी जोड़ा गया था।बाद में बीजेपी के प्रवक्ता राम माधव ने कांग्रेस पर जमात-उद-दावा लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठन को बचाने का आरोप लगाया था।
2013 में ही BJP ने संसदीय कार्यवाही में शामिल ना होने की धमकी दी जिसके बाद तत्कालीक गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने फरवरी 2013 में "हिंदू आतंकवाद" शब्द पर BJP और आम भारतीय से माफी मांगी और उन्होंने कहा कि आतंकवाद को धर्म से जोड़ना मेरी गलती थी ।
कांग्रेस को कटघरे में लाना यहां इसीलिए जायज है क्योंकि विश्व की अग्रणी थिंक टैंक और शोध संस्थान जिसमें आईडीएसए भारत से,नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर यानी एनसीटीसी अमेरिका से,तथा साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल ने अपने सभी जांच दस्तावेजों में मुख्य रूप से हूजी अर्थात हरकत-उल-जिहाद-अल इस्लामी को विस्फोट के लिए जिम्मेदार बताया था ।
ऐसे में पूर्व में किए गए एनआईए की जांच में आरएसएस के नेताओं को फंसाने की साजिश की बू आती दिख रही है।जिसमें तत्कालिक कांग्रेस सरकार की भूमिका हो सकती है,साथ ही जांच संगठन एनआईए भी सवाल उठता है कि क्या एनआईए सरकार के पक्ष में कार्य करती है।
एनआईए ने अप्रैल 2011 में जांच प्रारंभ किया। एनआईए का जांच सीबीआई और पुलिस के चार्जशीट पर शुरू किया गया था जिसमें 226 गवाहों को कोर्ट के सामने प्रस्तुत किया गया था जिसमें दस्तावेजों की संख्या 411 थी। 16 अप्रैल 2018 यानी कि आज के फैसले में सभी 11 आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया।

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