राजनीति

हैप्पी बर्थडे बीजेपी: 38 साल में 2 से 282 तक पहुँचनें की कहानी

आजादी के बाद कांग्रेस के प्रभुत्व को खत्म करनें के लिए 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी नें जनसंघ नाम की पार्टी बनाई. यह पार्टी बनी हीं थीं हिन्दूओं की आवाज उठानें के लिए, क्योंकि तब कांग्रेस और जवाहरलाल नेहरू मुस्लिमों के हितैषी बन बैठे थे. हिंदू राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नें अपनें प्रचारकों को पार्टी में शामिल कराया. 1952 के आम चुनाव में पार्टी को केवल 3 सीटें मिली. श्री मुखर्जी के निधन के बाद कुछ दिनों तक मौलीचंद शर्मा और फिर दिनदयाल उपाध्याय के हाथों में पार्टी की कमान आ गई. 1965 वह साल था जब श्री उपाध्याय नें 'आंतरिक मानवतावाद' का सिद्धांत दिया जो आज बीजेपी का मुख्य विचारधारा है.

1967 के राज्य विधानसभा चुनाव में जनसंघ नें अन्य दलों के साथ मिलकर पहली बार बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश में सरकार बनाई. यही वह समय था जब पार्टी की कमान अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे युवा नेताओं के हाथ आ गई थी.

1977 में इमरजेंसी खत्म होनें के बाद जनसंघ, राष्ट्रवादी लोकदल और कई पार्टियों नें मिलकर एक नया दल 'जनता पार्टी' का गठन किया. इनका एकमात्र उदेश्य था 'इंदिरा गांधी को सत्ता से उखाड़ फेंकना'. और इसमें वे कामयाब भी हुए. मोरारजी देसाई के नेतृत्व में सरकार बनी जिसमें सबसे ज्यादा योगदान 93 सीटों के साथ जनसंघ का रहा. जनसंघ के नेताओं की आरएसएस से ज्यादा नजदीकी थी जो उसमें मौजूद अन्य दलों को रास नहीं आई. ठीक उसी आसपास देश के कई भागों में हिंदू मुस्लिम दंगे हुए जिसमें जनसंघ के नेताओं पर शामिल होनें का आरोप लगा. पार्टी के एक धड़े द्वारा जनसंघ को पार्टी से निकलनें को कहा गया लेकिन उसनें ऐसा करनें से इंकार कर दिया.

इसके बाद उन सदस्यों नें अलग होकर 'जनता पार्टी सेक्युलर' बना लिया. अल्पमत में देसाई की सरकार गिर गई, आम चुनाव हुए जिसमें जनता पार्टी नें केवल 31 सीटें जीती. अप्रैल 1980 में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रस्ताव पारित हुआ कि कोई भी पार्टी मेंबर पार्टी और आरएसएस दोनों में नहीं रह सकता . इस प्रस्ताव का नतीजा हुआ कि 6 अप्रैल को अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पुराने जनसंघ के नेताओं नें अलग होकर एक नई पार्टी बनायी. जिसे हम 'भारतीय जनता पार्टी' 'भाजपा' या 'बीजेपी' के नाम से जानते हैं.

फेमस  इतिहासकार रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि 'जनता पार्टी सरकार के समय से हीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रभाव बढ़ता गया जिसे बाद में 1980 के शुरूआती सालों में हिंदू-मुस्लिम दंगों के लहर के रूप में देखा गया' . हालांकि इस समर्थन के बाद भी बीजेपी नें अपनें पुरानें 'हिंदू राष्ट्रवाद' का प्रचार प्रसार करना जारी रखा. लेकिन वाजपेयी की यह रणनीति 1984 आम चुनाव में फेल हो गई, पार्टी को केवल दो सीटें आयीं. वाजपेयी के उदारवादी रणनीति के असफल होनें के बाद पार्टी नें तय किया कि अब हिंदुत्व यानि कट्टर हिंदूवाद के साथ हीं आगे बढ़ना हैं.

अटल जी से गर्म खून वाले लालकृष्ण आडवाणी को अध्यक्ष बना दिया गया. 1980 के शुरूआत से हीं विश्व हिंदू परिषद नें अयोध्या में बाबरी मस्जिद को तोड़कर राम मंदिर बनानें का अभियान छेड़ रखा था. उसका कहना था कि राम की जन्मभूमि पर बाबर नें मंदिर तोड़कर मस्जिद का निर्माण कराया था इसलिए अब यहाँ मंदिर बनेगा. आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा 'रामजन्म भूमि आंदोलन' की आवाज बनी. पार्टी नें इसे अपनें मुख्य चुनावी एजेंडे में शामिल कर लिया. फलस्वरूप 1989 चुनाव में 86 सीटें मिली जिससे बीजेपी नें समान विचारधारा वाले वीपी सिंह सरकार को महत्वपूर्ण समर्थन दिया.

1990 में लालकृष्ण आडवाणी नें रामजन्मभूमि नें समर्थन में अयोध्या के लिए रथयात्रा आरंभ कर दी. बिहार सरकार नें आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया लेकिन कार सेवकों एवं संघ कार्यकर्ताओं को आगे बढ़नें से नहीं रोक सके. सभी बाबरी मस्जिद तोड़नें को उतारू थें, अर्द्धसैनिक बलों के साथ बड़ी झड़प हुई, कई कारसेवक मारे गए... नतीजा हुआ बीजेपी नें तत्काल वीपी सरकार से समर्थन वापस ले लिया.

अगले चुनाव में बीजेपी को जनता का और समर्थन मिला. इसबार पार्टी को 120 सीटें मिली. 6 दिसंबर 1992 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित सभी हिंदू संगठनों नें रैली की जिसमें विहिप और भाजपा कार्यकर्ता भी शामिल थें. इसनें बाबरी मस्जिद पर हमला कर दिया.. पूरी तरह हमलावर हो चुकी भीड़ नें बाबरी मस्जिद को गिरा दिया. इसके बाद देशभर में हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे. हजारो लोग मारे गए.. विश्व हिंदू परिषद को कुछ समय के लिए बैन कर दिया गया और आडवाणी सहित बड़े भाजपा नेताओं को अरेस्ट कर लिया गया. इस विध्वंस के लिए आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी सहित 68 नेताओं को दोषी पाया गया.

यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के ऊपर आरोप लगा कि उन्होनें उन अधिकारियों को अयोध्या में पोस्ट किया जो घटना के समय चुप रहें.भाजपा एक दक्षिणपंथी पार्टी है जिसके तीन मुख्य एजेंडे रहें हैं पहला, कश्मीर से धारा 370 हटाना, दूसरा अयोध्या में राम मंदिर बनवाना और तीसरा यूनिफार्म सिविल कोड लागू करना.. 1996 का चुनाव भी इन तीनों मुद्दों के साथ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर लड़ा गया. भाजपा 181 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी. अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में कई दलों से गठबंधन के बाद सरकार बनाई जो केवल 13 दिन तक चल सकी. 1998 में फिर लोकसभा चुनाव हुए जिसमें भाजपा नें समता पार्टी, अन्नाद्रमुक, बीजू जनतादल, शिवसेना, अकाली दल जैसी पार्टियों के साथ गठजोड़ किया. इसमें केवल शिवसेना हीं ऐसी पार्टी थी जिसकी विचारधारा भारतीय जनता पार्टी से मिलती थी.

इस बार तेलुगूदेशम पार्टी के सहयोग से वाजपेयी प्रधानमंत्री बनें लेकिन अन्नाद्रमुक मुखिया जयललिता के समर्थन वापस लेनें से सरकार गिर गई. 1999 में अन्नाद्रमुक के बिना अटल बिहारी वाजपेयी नें गठबंधन सरकार बनाई जिसमें आडवाणी गृहमंत्री बनें. 2000 में बंगारू लक्ष्मण पार्टी अध्यक्ष बनें लेकिन तहलका के स्टिंग में 1 लाख घूस लेते पकड़े जानें के बाद उन्हें हटना पड़ा. 2002 में गुजरात के गोधरा में अयोध्या से आ रही कारसेवकों से भरी रेलगाड़ी को मुस्लिमों नें आग लगा दी जिसके बाद गुजरात में दंगे भड़क गए. करीब दो हजार लोग मारे गए. उस समय राज्य में भाजपा की सरकार थी, मुख्यमंत्री थें नरेंद्र मोदी.. उनपर दंगाईयों को पूरा सपोर्ट देनें का आरोप लगा लेकिन एसआईटी की जाँच में मोदी निर्दोष पाए गए लेकिन भाजपा विधायक माया कोडनानी को दोषी पाया गया.

2004 में अतिआत्मविश्वास में आकर वाजपेयी सरकार नें समय से छः महीनें पहले चुनाव करानें का निर्णय लिया. भाजपा का नारा था 'शायनिंग इंडिया' मतलब चमकता भारत.. पार्टी को उम्मीद थी कि उसके आर्थिक नीतियों को जनता नें पसंद किया इसलिए जीत तय है. लेकिन चुनाव बाद अप्रत्याशित रिजल्ट में कांग्रेस के 222 के मुकाबले भाजपा को 186 सीटें मिली. 2008 में भाजपा नें पहली बार किसी दक्षिण भारतीय राज्य में सरकार बनाई. कर्नाटक में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला. 2009 के लोकसभा चुनाव में लालकृष्ण आडवाणी को पीएम पद का उम्मीदवार बनाकर उतरी पार्टी को केवल 116 सीटें मिली. 2014 में दस साल तक सत्ता से बाहर रहनें के बाद नरेन्द्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी नें ऐतिहासिक जीत दर्ज की. अकेले भाजपा को 282 सीटें मिली जो बहुमत से 10 ज्यादा थीं.

उसके सहयोगियों को मिलाकर राजग को कुल 336 सीटें मिली. इस चुनाव में नरेन्द्र मोदी नें 'विकास' और 'अच्छे दिन' के नारे के साथ चुनाव लड़ा जिसमें हरेक वर्ग का साथ मिला.. खासकर युवाओं में मोदी के लिए गजब का क्रेज था. प्रधानमंत्री बननें के बाद नरेन्द्र मोदी नें जल्द हीं अपनी पहचान एक 'वैश्विक नेता' के रूप में बना ली. संप्रग सरकार के कार्यकाल में भारत की जिस तरह से प्रतिष्ठा धूमिल हुई थी, उसे नरेंद्र मोदी वापस लानें में कामयाब हुए हैं.

इस सरकार नें देश में डिजिटल क्रांति लाई है वहीं गरीबों के लिए जनधन और उज्जवला योजना जैसी कल्याणकारी योजनाएं लाई है. इसी का परिणाम है कि आज देश के 20 राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा को उत्तर प्रदेश, असम, मणीपुर, त्रिपुरा जैसे राज्यों में जीत मिली. आज यह पार्टी 38 साल की हो गई है.. 2019 के आमचुनाव भाजपा के लिए कठिन परीक्षा है क्योंकि विपक्षी पार्टियाँ दलित और मुस्लिम कार्ड खेलकर जनता का भाजपा के प्रति मोहभंग करनें का प्रयास कर रही है. कोई कितना भी विरोध करे लेकिन इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार नें देश को नई बुलंदियों पर पहुँचाया है.

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