राजनीति

उठो बीजेपी सवेरा हुआ, जनता के 'मूड' को समझनें का बेड़ा हुआ.. उपचुनाव का संपूर्ण विश्लेषण

जब आप किसी बाजी में अपनें विरोधी को शिकस्त देते हैं,तो आप यह सोंचकर नहीं बैठ सकते कि अब वह कभी हमारा मुकाबला नहीं कर पाएगा। हो सकता है, अगली बार वह और तैयारी के साथ आए। लेकिन यही गलती कर दी भारतीय जनता पार्टी नें उत्तर प्रदेश में अपने प्रतिद्वंद्वी को कमजोर समझना इतना महंगा साबित हुआ कि भाजपा अपनें मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री की प्रतिष्ठित सीट भी गँवा बैठी किसी नें सही कहा है कि 'सत्ता कभी स्थायी नहीं होती.

पहले 2014 के लोकसभा चुनाव में 80 में से 73, और फिर 2017 में विधानसभा चुनाव में 310 सीटें जीतनें के बाद बीजेपी नें सोंच लिया कि काँग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी को उसने यूपी से ठिकाने लगा दिए। लेकिन समय बदला,साल बदला..

आखिर हुआ क्या ??

गोरखपुर से सांसद योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के सीएम बने और फूलपुर से सांसद केशव प्रसाद मौर्या को उपमुख्यमंत्री पद मिला दोनों को नियमानुसार विधान परिषद् से सदस्य बनना पड़ा और दोनों सीटें हो गई खाली। उपचुनाव की घोषणा हुई, जैसे हीं प्रचार चरम पर था बसपा सुप्रीमों मायावती और सपा मुखिया अखिलेश यादव नें हाथ मिला लिए। मतलब साईकिल और हाथी साथ साथ कमल को रौंदनें के लिए तैयार।

बीजेपी इस बार कुछ ज्यादा सुस्त नजर आई,कार्यकर्ताओं में वह जोश नजर नहीं आया जो योगी के सांसद रहते होता था। खबर तो यह आई कि बीजेपी का बूथ मैनेजमेंट जो गजब का होता था,इतना खराब रहा कि जिन लोगों को बूथ का जिम्मा सौंपा गया,वे वहाँ पहुँचे हीं नहीं। नतीजा यह रहा कि जो सीट 1989 से गोरक्षपीठ के महंत के पास रहती आईं,(पहले अद्वैतनाथ और 1999 से लगातार पाँच बार योगी आदित्यनाथ), वहाँ मुँह की खानी पड़ी।

भाजपा नें यहाँ के 1.5 लाख ब्राह्मण वोटों को भुनानें के लिए उपेन्द्र शुक्ल के रूप में ब्राह्मण चेहरा उतारा वहीं सपा नें 3.6 लाख वोटों की हैसियत रखनें वाले निषाद समाज के प्रवीण निषाद को टिकट दिया। इस सीट पर दो लाख के करीब यादव और दलित वोट भी है,जिसका सपा बसपा मिलन के बाद ध्रुवीकरण हुआ। लगभग 22 हजार वोटों का अंतर रहा हार और जीत में। बीजेपी मदहोश सी पड़ी रही और किला दड़क गया। दूसरी तरफ फूलपुर से नागेंद्र पटेल नें 59 हजार वोट से बीजेपी के कौशलेंद्र पटेल को हरा दिया। 2014 के चुनाव में दोनों सीटों पर वोटिंग का प्रतिशत क्रमशः 54 और 50% था वहीं इसबार यह 47 और 37% रहा।

बीजेपी के वोटरों में वोटिंग को लेकर उत्साह नहीं दिखा और यही लुटिया डुबो गया। हार के बाद योगी नें सही हीं कहा कि हमारे अतिआत्मविश्वास के कारण हार हुई है,हमनें सपा-बसपा गठबंधन को कम करके आँका। वहीं बिहार में भी अररिया लोकसभा सीट और भभुआ,जहानाबाद पर हुए उपचुनाव में बीजेपी के लिए ज्यादा अच्छी खबर नहीं रही।

सवर्ण के गढ़ भभुआ में फारवर्ड चेहरा रानी पांडेय की जीत जरूर हुई लेकिन जहानाबाद और अररिया लोकसभा सीट पर हार मिली। यहाँ यह साबित हो गया कि राजद अभी भी भाजपा-जदयू को अकेले दम पर मात देनें को तैयार है। सीमांचल की अररिया सीट कभी भी भाजपा का गढ़ नहीं रहा,यहाँ तक की मोदी लहर में भी यह सीट नहीं मिली। इसबार जदयू का साथ जरूर था,लेकिन चुनाव में जीत के लिए नाकाफी।

इन चुनाव परिणामों के क्या है मायनें ??

2014 के बाद बीजेपी नें गुजरात के वडोदरा और एमपी के शहडोल लोकसभा सीट की जीत को छोड़कर किसी भी उपचुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है। पहले पंजाब के गुरूदासपुर से शुरू हुआ हार का कारवां राजस्थान के अलवर,अजमेर होते हुए अब यूपी के फूलपुर और गोरखपुर पहुँच चुका है। बीजेपी के लिए खतरे की घंटी बज गई,या यूँ कहे कि पिछले एक साल से बज रही है। बड़े बड़े रणनीतिकारों से भरी पार्टी बीजेपी के लिए अब आत्ममंथन का समय है। उपचुनावों में हार उन राज्यों में हुई है जहाँ बीजेपी की सरकार है। हिंदी भाषी राज्यों में हुई हार परेशानी का सबब है।

2019 में लोकसभा चुनाव से पहले कर्नाटक,मध्यप्रदेश,राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा के चुनाव सेमीफाइनल है,जिसपर सबकी निगाहें टिकी होंगी। बीजेपी उपचुनाव में हारी जरूर है,लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह अब जनाधार खो चुकी है। आज भी यह पार्टी देश के 21 राज्यों में सत्ता में है और नरेन्द्र मोदी के रूप में ऐसा प्रभावशाली नेतृत्व उसके पास है,जिसे हार किसी कीमत पर मंजूर नहीं है।

देश का मूड बदलते समय नहीं लगता। 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार नें जब 'शायनिंग इंडिया' का नारा देते हुए समय से 6 महीनें पहले अपनें पक्ष में बनें माहौल को भुनानें के लिए चुनाव करवा दिया, किसी नें नहीं सोंचा था कि बीजेपी हार जायेगी। लेकिन नतीजा हुआ कि बीजेपी दस साल तक सत्ता से दूर चली गई। अटल युग खत्म हो चुका है, अब मोदी युग चल रहा है। बीजेपी के लिए यह सिर्फ अलार्म बजा है, समय है जग जानें का। 'उठो बीजेपी सवेरा हुआ, जनता के मूड को समझनें का बेला हुआ'...

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