व्यंग

व्यंग्य: बुरा ना मानों दिवाली है

सुप्रीम कोर्ट के दिल्ली में पटाखा बैन करनें के आदेश के बाद परेशानी बढ़ी हुई दिख रही है। बच्चे रो रहे हैं क्योंकि उन्हे पटाखे नहीं मिल रहे है बच्चे तो ठहरे बच्चे,उन्हे क्या पता कि कोर्ट नें क्या किया या क्या न किया।

सुनने में आया कि बहुत सारे दुकानदार पटाखे को गिफ्ट का रूप देकर होम डिलीवरी कर रहे हैं। आज के समय में वे दुकानदार अंकल बच्चों के लिए सेंटा क्लाज से बढ़कर हैं,जो उन्हें चुपके से पटाखे दे रहे हैं।परेशानी का एक और आलम यह है कि दिल्ली में बोतल तो है,लेकिन पटाखे पर रोक है। पटाखे इतनें नाराज हैं कि फैसले के खिलाफ अपील भी कर दें, असहिष्णुता के शिकार लोगों का साथ भी जरूर मिल जाता।लेकिन क्या करें सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में हीं चुनौती, ना बाबा ना।

लोग परेशान जरूर हैं लेकिन खुश भी ...क्योंकि दिल्ली में बोतल मिल रही है तो पटाखे नहीं,लेकिन बिहार में पटाखे तो हैं लेकिन बोतल नहीं। हाँ, यूपी एमपी वाले फायदे में है,वहाँ दोनों उपलब्ध है। बहरहाल इस बैन नें 'फुलझड़ी' की परेशानी बढ़ा दी है। उसे समझ में नहीं आ रहा कि कोर्ट का फैसला उसपर लागू होगा या नहीं...क्योंकि है तो वो शांत कैटेगरी की। लेकिन कभी कभी बम बननें का मन उसे ब्लास्ट करनें पर मजबूर कर देता है। कोर्ट नें इन सबपर तो बैन लगा दिया लेकिन रास्ते पर चलती लड़कियों या महिलाओं को 'पटाखा', 'फुलझड़ी' कहनें पर रोक कब लगेगी? इससे पर्यावरण प्रदूषित नहीं होता क्या?  पटाखा का इस्तेमाल आमतौर देहाती भाषा में तड़कती भड़कती शारीरिक भाषा को बतानें के लिए करते हैं उसमें भी विपरीत लिंग वालों को विशेषरूप ।

लेकिन चूँकि हम आवश्यकता से ज्यादा संस्कारी हैं इसलिए पटाखा का मतलब आलू बम ,हाइड्रो बम से हीं समझते हैं। अब गाँव देहात में फाइव स्टार पटाखेे तो उड़ाते हीं नहीं हैं तो नाम ना लेना हीं बेहतर है। लेकिन अमीरजादों को उड़ाते देख लेते हैं,संतुष्टि हो जाती है। हजार पंद्रह सौ के एक पटाखे उड़ाना हमारे बस की बात कहाँ ,इतनें में तो दो क्विंटल आलू हो जाए या चीनी भी पच्चीस तीस किलो से कम ना हो। लेकिन इन परेशानियों से भी बड़ी परेशानी राकेट के साथ है।पिछले साल से उसे रम या व्हिस्की वाले बोतल के दर्शन नहीं हो रहे। बिहार में शराब की बोतल बंद है,यह बात अलग है कि जहाँ चाहो वहाँ मिलती है।

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कानून का सबसे ज्यादा पालन बच्चे हीं करते हैं क्योंकि उन्हें पुलिस से डर जो लगता है। अब हम शरीफ बच्चे तो बस इतना समझते हैं कि बोतल मतलब शराब की बोतल। इसलिए राकेट को हाथ भी ना लगाते क्या पता पुलिस वाले अपनें मजबूत डंडों के साथ कब आ धमकें। पिछले कुछ वर्षों से महँगाई के कारण आलू और हाइड्रो बम पहले हीं फूट जाते हैं, जो बचते है वो हमें नसीब होते हैं,लेकिन फुस्स बम के रूप में। जनाब हम बम उड़ाते जरूर है लेकिन आतंकवादी नहीं, हमपर मकोका और पोटा मत लगाना, लंबी जिंदगी जीनें का शौक है। एक तो पटाखे उड़ाते वक्त भी जान हथेली पर होती है,लेकिन कभी कभी हथेली भी बम के चपेट में उड़ जाती है। सोंचता हूँ कि अगर  पटाखे खरीदने में भी आरक्षण हो तो कितना अजीब होगा। जैसे, 50% रॉकेट सिर्फ अनुसूचित जाति वाले उड़ायेंगे, वहीं 33% हाइड्रो सामान्य वर्ग वाले। पटाखे पर बैन लगाना न लगाना सरकार और कोर्ट की मर्जी या फिर महँगाई की मर्जी भी हो सकती है लेकिन प्याज और बेसन के पकौड़े,आलू के चटक मटक पकौड़े, भजिया खानें से कौन रोक सकता है।

वो तो हम लेकर रहेंगे चाहे पटाखों में सिर्फ़ छुरछुरी या फुलझड़ी हीं क्यों ना उड़ायें।  (यह एक व्यंग्य है जिसका उद्देश्य किसी की भावना का मजाक उड़ाना नहीं है। हम सरकार और कोर्ट के फैसले का आदर करते हैं। हाँ, अगर इसे आप अपनें ऊपर लेते हैं तो लें, हम तो पटाखे उड़ाकर रहेंगे......क्योंकि हम दिल्ली से बाहर हैं

The Nation First परिवार की ओर से पूरे भारतवर्ष को दिपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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