व्यंग

नेता जी आप से ना हो पाएगा !

बहुत ठंडी थी और मैं रजाई के आगोश में गहरी नींद में सोया हुआ था तभी देश भक्ति गीतों की ध्वनि और भारत माता की जय, जैसे नारे गूंजने लगते हैं । फिर देश का उत्थान करने वाले कुछ लोग आते हैं और मुझे भी अपने झुंड में शामिल होने के लिए कहते हैं और मैं भी चुप-चाप उनके साथ चल देता हूँ । मेरे अंदर भी देश भक्ति की ऊर्जा का संचार हो रहा था और तुरंत बगल वाले के हाथों से तिरंगा झंडा को अपनी हाथों में ले कर जोर-जोर से नारे लगाने शुरु करता हूँ भारत माता की जय ,जय हिन्द, और इस देश मे रहना है तो भारत माता की जय कहना होगा । मेरे साथ चल रहे लोग भी इस नारे को दुहरा रहे थे ।

ताज्जुब की बात तो यह थी कि जिसके साथ मैं देश भक्ति से ओतप्रोत नारे लगा रहा था उन्हें मैं जानता तक नहीं था, फिर भी उनके साथ मैं चलता जा रहा था क्योंकि मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वास्तव में देश आज ही गुलामी की जकरण से बाहर आई हो । धीरे-धीरे यह झुंड बड़ा होता जा रहा था और आगे बढ़ता जा रहा था आगे बढ़ते बढ़ते अचानक से पूरा झुंड रुक गया लेकिन नारे उसी जोश में लगाये जा रहे थे । जहां झुंड रुकी थी, मैन देखा तो वहां मुझे एक बड़ा से मंच नजर आया और 15-20 की संख्या में पजामा कुर्ता पहने लोग उस मंच पर धीरे धीरे चढ़ कर अपना स्थान ग्रहण कर रहे थे और अभी भी नारे उसी जोश में लगाये जा रहे थे ।

नेता जी मंच से लोगों के साथ नारे लगाने शुरु करता है और फिर लोगों से शांति बनाए रखने की अपील करता है लोग चुप हो जाते हैं लेकिन मैं लोगों के चुप होने के बाद भी नारे लगाए जा रहा था तभी मंच पर रखी कुर्सी से उठ कर एक मोहोदय माइक के पास आते हैं और वो भी मेरे साथ नारे लगाने शुरु कर देते हैं फिर वो चुप होने की अपील करते हैं दरअसल अपील करने वाले कोई नेता जी थे और मैं चुप हो जाता हूँ । नेता जी लीगों को संबोधित करने लगते हैं दूसरे शब्दों में कहें तो उनकी भाषणबाजी शुरु हो जाती हैं जिससे मुझे शुरू से ही चिढ़ मचती है लेकिन फिर भी न चाहते हुए भी मैं उनकी भाषणों को सुनने लगता हूँ ।

उन नेता जी की भाषणों से लग रहा था कि वो किसी विपक्षी पार्टी से हैं जो सत्ता पाने की कोशिश कर रहे थे और कह रहे थे की ये सरकार समाजवाद को लाने में असफल रही है अगर मुझे आप लोग एक बार मौका दें तो मैं आप लोगों के बीच पूर्ण समाजवाद लाऊँगा । और तभी कुछ लोग समाजवाद को लाने के लिए निकल पड़ते हैं और समाजवाद शहर से दूर एक पहाड़ पर खड़ा है । पहाड़ की ऊंचाई काफी ज्यादा थी. समाजवाद को लाने गये लोग किसी तरह से उस चोटी पर चढ़ जाते हैं ।

सारे लोग मनुष्य रूपी समाजवाद का हाथ पकड़ कर ही रहे थे तभी कुछ सर पे टोपी पहने लोग पहुँचते हैं और कहते हैं समाजवाद को मैं ले कर जाउंगा क्योंकि हमारी पार्टी सत्ता में है और इस पर मेरा अधिकार है । अब समाजवाद को दोनों तरफ से पकड़ कर खींचना शुरु करते हैं साथ हीं बीच बीच मे भारत माता की जय का नारे भी लगा रहे थे । तभी उनमें से कुछ लोग बोलते हैं समाजवाद तुम मेरे साथ चलोगे, वो ऐसे अधिकार जता रहे थे मानो वो उनका सागा भाई हो, तभी दूसरी पार्टी कहने लगती है आपने इतने सालों में भी समाजवाद को नही लाया इसलिए ये हमारे साथ ही जायेगा और अचानक एक व्यक्ति पीछे से समाजवाद को धक्का देना शुरू करता है साथ ही दोनों ओर से खिंचा तानी भी जारी रहती है जिससे समाजवाद लहू लुहान हो जाता है ।

वहीं शहर में लोग भगवान के दरबार में गुहार लगाते हैं कि हे भगवान बस किसी भी तरह से हमारे बीच समाजवाद को ला दिजीये आप हीं मात्र एक सहारा हैं । वहां मंच पर भी भाषणबाजी जारी रहता है और आवाजें आती हैं समाजवाद हमारे विपक्षी नही ला सकते उसे तो हम हीं लाएंगे । उधर पहाड़ पर खड़ा समाजवाद लहूलुहान परा कहता है मुझे शहर में ले चलो यहां मेरी कोई ज़रूरत नहीं है वैसे भी मैं यहां अकेले बोर हो रहा हूँ । दोनों ही पार्टियां समाजवाद को खींचता हुआ शहर की ओर लाने की कोशिश करता हैं और उधर अचानक हाई कमान से आदेश होता है कि समाजवाद शहर के लिए रवाना हो चुका है उसकी स्वागत की तैयारी की जाए ।

शहर के सारे अधिकारियों के फ़ोन पर संदेश भी भेज दिये जाते हैं और एसडीओ साहब पास के दरोगा जी को संदेश भेजते हैं । दरोगा जो छोटे बाबू से कहते हैं पांडे जी, जो समाजवाद वाला संदेश आया है उसमें का लिखा है पढ़िए तो ज़रा, छोटे बाबू साहब इस संदेश को आये तो 5 दिन हो चुका है पता नही समाजवाद कितना दूर निकल गया होगा । ये सुनते हीं दरोगा जी का आदेश होता है तो सोच का रहे हैं डिलीट कर दीजिए संदेश को.. कहा देंगे कोई संदेश आया हीं नहीं ।

तभी बड़े अधिकारियों में से एक अधिकारी कहता है ये समाजवाद बाद में नहीं आ सकता क्या हम उसकी सुरक्षा की ज़िमेदारी को नही उठा सकते मुझे शादी में ससुराल जाना है आप लोग किसी भी तरह से उसका आना कैंसिल करवाइये और अगले माह की पूर्णमासी का दिन रख दीजिए वो दिन इसके लिए शुभ होगा । तभी हाई कमान से आदेश होता है समाजवाद को लाने गए समाजवादी उसे लाने में असमर्थ हो गए अब समाजवाद का आना अनिचित काल के लिए स्थगित कर दिया गया है । साथ हीं मंच पर भाषण भी बंद हो गई इसी बीच मेरी नींद खुल जाती है और माँ कहती हैं कॉलेज नही जाना क्या आज 26 जनवरी है ।

जिस देश मे समाजवाद को लाने की बात सिर्फ मंच से किया जाए , जिस शासन व्यवस्था में संदेश को मिटा दिया जाए , ससुराल जाने के लिए समाजवाद को लाने के लिए पूर्णमासी का दिन रखा जाए ठीक है रखिये मुझे इससे कोई ऐतराज नहीं है, हो सकता है समाजवाद इस देश मे जनता, प्रशासन और नेताओं के द्वारा ना आकर मोबाइल से हीं आ जाये फिर तो यह एक ऐतिहासिक घटना होगी और भारत के बाद पूरे विश्व में समाजवाद मोबाईल से हीं आएगी ।

यह भी पढ़ें

व्यंग: मरण दिन नाहीं ऊ त ज़बह दिन होवत

भई ई जनम में हमसे ना हो पाई

2,127 total views, 3 views today

Facebook Comments

Leave a Reply