इतिहास के पन्नों से जरा हट के राजनीति

क्या है आरक्षण का इतिहास, देश में पहली बार कब लागु हुआ था आरक्षण

भारत  एक ऐसा देश है जहां की राजनीति जातीवाद और आरक्षण से शुरू होती है और उसी के गलीयारे मे  दम भी तोड़  देती है । पार्टी कोई भी हो उसका चुनावी मुद्दा मात्र जातीवाद और आरक्षण से ही शुरू होती है और तमाम चुनावी वादे भी कहीं न कहीं इसी के परिधी मे घुमती रहती है क्योंकि कही न कही नेताओं को लगता है भारत मे अगर अपनी जीत दर्ज करानी है तो इसका सबसे बड़ा हथियार जातीवाद और आऱक्षण है और शायद यह सत्य भी है क्योंकि अगर हम भारत मे वोटबैंक की बात करें तो वैसे लोगों की संख्या ज्यादा है जिन्हें आऱक्षण प्राप्त है ।

क्या है आरक्षण

आरक्षण का अर्थ होता है सुरक्षीत करना, तो यह किस तरह की सुरक्षा है जहां जातीवादी रोटी सेक कर लोगों को सुरक्षा प्रदान किया जा रहा है? एक तरफ तो हमारी सरकार ये कहते फिरती है की इस देश के तमाम नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त है कोई भी समुदाय एक दुसरे से भिन्न नहीं है और कानूनी तौर पर अगर कोई जातीवाद को हवा दे तो उसके लिए दण्ड का भी प्रावधान है.

दुसरी तरफ इसी समाज को ओबीसी, एससी, एसटी, बीसी 1, बीसी 2 और जेनरल के नाम पर सरकार ही बांटने का काम करती है और अगर  इससे कोई तबाह होता है तो वो है सामान्य वर्ग क्योंकि अगर किसी परीक्षा में एक सामान्य वर्ग के छात्र को 200 में 120 नंबर प्राप्त होता है और किसी अन्य वर्ग जैसे OBC, SC, ST, आदि वर्ग क छात्रों को 200 में 100 नंबर भी प्राप्त होता है तो यहाँ इनका चयन तो हो जायगा लेकिन 120 नंबर लाने वाले छात्र को जिन्हें सामान्य वर्ग में रखा गया है उनका चयन मात्र इस बात से नहीं हो पता क्योंकि वो OBC या  SC, ST नहीं है यानि की उस छात्र क लिए सामान्य वर्ग का होना जीवन का सबसे बड़ा दंस है जबकी वो भी उतना ही मेहनत करता है जितना की अन्य वर्ग के छात्र .

क्या रहा है इसका इतिहास और किसे कितना आरक्षण प्राप्त है

अगर भारत मे आरक्षण के इतिहास की बात करें तो आजादी से पहले ही 1882 मे पहली बार हंटर कमीशन का गठन करके इस आग को सुलगाया गया था जिसमे महात्मा ज्योतिराव फुले ने वंचित तबके के लिए मुफ्त एंव अनिवार्य शिक्षा की वकालत करते हुए आनुपातिक प्रतिनिधित्व की मांग कि थी .

उसके बाद 1891 मे श्रावणकोर रियायत में  सिविल नौकरीयों मे बाहरी के जगह भारतीयों को सरकारी नौकरी देने की बात की गई, फिर 1901 मे कोल्हापुर मे साहुजी महराज ने वंचित लोगों के लिए 50 प्रतिशत आऱक्षण का व्यवस्था किया और उसके बाद 1908 मे अंग्रेजों ने भी प्रशासन ने कम हिस्सेदारी वाली जातीयों की भागीदारी बढ़ाने का प्रावधान किया ।

1921 में मद्रास प्रेसिडेंसी ने एक सरकारी आदेश जरी किया जिसमें गैर ब्राहमणों के लिए 44 फीसदी , ब्राहमण , मुस्लमान और ईसाईयों के लिए 16-16 फीसदी और अनुसूचित जातिओं के लिए 8 फीसदी आरक्षण दिया गया था लेकिन उसके बाद  भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत सरकारी आरक्षण को सुरक्षित किया गया .

1942 में भीम राव अम्बेडकर ने सरकारी सेवाओं और शिक्षा के क्षत्रों में अनुसूचित जाती के लिए आरक्षण की मांग उठाई लेकिन साथ ही भीम राव अम्बेडकर का कहना था की आरक्षण देश में अल्प समय के लिए है यानि लगभग 10 वर्षों के लिए लागु किया जाये लेकिन यह देश के नेताओं की जीत का सबसे बड़ा मन्त्र बन गया .

अगर आजादी के बाद भारत मे आऱक्षण व्यवस्था की बात करें तो अनुशुचित जाती जन जीतीयों के लिए 10 वर्षों के लिए आरक्षण का प्रावधन किया गया था उसके बाद लगातार आरक्षण की समय सीमा को बढ़ाया  गया और 1979 मे मोरारजी देसाई की सरकार ने मंडल कमीश्न आयोग  का गठन किया जिसके अध्यक्ष बिंदेश्वरी प्रसाद मंडले थे .

इस आयोग ने 1930 के जनसंख्या के आंकड़ो के तहत  1257 समुदायो को पिछड़ा घोषित कर इनकी आबादि 52 प्रतिशत कर दिया  और 1980 मे अपनी रिपोर्ट सौंपते हुए आरक्षण को 22 प्रतिशत से बढ़ा कर 49.5 प्रतिशत करने की बात कही उसके बाद 1990 मे वीपी सिंह की सरकार ने इसे लागू किया  जिसमे ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत, अनुसूचित जाती के लिए  ( sc) 15 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति(st)  के लिए  7.5 प्रतिशत  निर्धारित कर दिया .

आरक्षण  मिलने से एक बड़ा तबका पीछे छुट गया  जिसने  इसके विरोध में  सुप्रिम कोर्ट में  याचिका दायर की लेकिन आयोग का फैसला कोर्ट भी नहीं बदल पाई और अब कोर्ट ने भी इस पर मुहर लगाते हुए 50 प्रतिशत आरक्षण निर्धीरित कर दिया और तब से लेकर आज तक देश मे आऱक्षण के नाम पर लगातार लोगों को बांटने का काम जारी  है  . इस रिपोर्ट के जरिये हमारा उद्देश्य हैं.

सच्चाई को दिखाना है ना की किसी वर्ग विशेष को आहात करना  हम ये नहीं कहते की आरक्षण नहीं होना चाहिए बेसक आरक्षण  होना चाहिए लेकिन किसी समुदाय के लिए नही बल्कि आरक्षण वैसे लोगों के लिए  होना चाहिए जो शारीरिक  और आर्थिक रुप से कमजोर हों ना की किसी जाती विशेष के लिए .

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