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वो 5 भारतीय कप्तान जिन्होंने बदल कर रख दी हिन्दुस्तान की क्रिकेट की किस्मत

न् 1932 में सीके नायडू की कप्तानी में भारतीय क्रिकेट का इंटरनेशनल स्तर पर आगाज हुआ था । आज 85 साल बाद भारतीय क्रिकेट टीम जमीन से आसमान तक पहुँच चुकी है । पहले जहाँ भारतीय टीम को सबसे कमजोर माना जाता था वहीं आज इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसी टीमें भी भारत के खिलाफ एक जीत के लिए तरसती है ।

इन बदलावों के पीछे नायडू से लेकर कोहली तक सभी कप्तानों की भूमिका किसी न किसी रूप में रही है । अबतक भारत के लिए टेस्ट में 33, वनडे में 24 और टी20 में 6 कप्तान हुए हैं । सभी कप्तानों नें अपनी कप्तानी में शत प्रतिशत दिया लेकिन हम आपको बता रहे हैं, इन कप्तानों में से पाँच सबसे बेहतरीन कप्तान,जिन्होनें मुश्किल समय में कप्तानी संभाली और टीम को जीतनें की आदत दिलाई । इनके आगे 'महान' शब्द भी छोटा दिखाई पड़ता है ऐसे कप्तानों की सूची में पहला स्थान मंसूर अली खान पटौदी का है -

1. मंसूर अली खान पटौदी - पटौदी राजघरानें के नबाव मंसूर अली खान की पहचान ऐसे कप्तान के रुप में की जाती की जिन्होनें टीम को जीतना सिखाया । उस समय भारती टीम के लिए टेस्ट मैच ड्रा कराना हीं सफलता का सूचक माना जाता था । लेकिन पटौदी नें टीम को ड्रा से निकल कर जीत के लिए खेलने का हौसला दिया । टीम जब कई गुटों में बंटी थी,तो पटौदी नें उसे एक इकाई में बदला ।

यहीं नहीं उन्होनें खुद आगे बढ़कर टीम का नेतृत्व किया । साहसिक फैसले लेने के बादशाह टाइगर को कप्तानी भी विषम परिस्थितियों में मिली थी । जब 1962 में भारतीय टीम वेस्टइंडीज दौरे पर थी वहीं बारबाडोस में चौथा टेस्ट खेला जाना था लेकिन चौथे टेस्ट से ठीक पहले एक अभ्यास मैच में कप्तान नारी कांट्रेक्टर के सिर में उस समय के सबसे खतरनाक गेंदबाज चार्ली ग्रिफिथ की तेज गेंद लगी और उसके बाद वो आगे खेलनें की हालत में नहीं थे ।

ऐसी स्थिति में नवाब को चौथे टेस्ट में कप्तानी सौंपी गई, उस समय उनकी उम्र 21 साल,77 दिन थी । इंग्लैंड में एक कार एक्सीडेंट में एक आँख गँवानें वाले मंसूर नें एक आँख से हीं अपना क्रिकेट खेला । भारत की विदेशी जमीं पर पहली टेस्ट जीत और पहली टेस्ट सीरीज जीत पटौदी के कप्तानी में हीं न्यूजीलैंड के खिलाफ आयी थी । 'टाइगर' के नाम से मशहूर जूनियर पटौदी नें कुल 46 टेस्ट खेले जिसमें 40 में कप्तानी की । उनकी कप्तानी में 9 मैचों में जीत मिली,12 ड्रा रहे वहीं 19 में हार मिली। 1971 में वेस्टइंडीज के खिलाफ सीरिज के लिए उन्हें कप्तानी से हटा दिया गया लेकिन तबतक वह देश के महान कप्तान कहलाने लायक उपलब्धि हासिल कर चुके थें ।

2.कपिल देव- नवाब पटौदी ने जहां टीम को ड्रा से ऊपर उठकर जितना सिखाया वही कपिल देव ने टीम को विश्व क्रिकेट में एक अलग पहचान दिलाई । अबतक के सर्वश्रेष्ठ भारतीय ऑलराउंडर कपिल को पहली बार कप्तानी का मौका 1982-83 में श्रीलंका के खिलाफ मिला,जब सुनील गावस्कर को आराम देने का फैसला लिया गया । एक पूर्ण कप्तान के रूप में कपिल का पहला दौरा वेस्टइंडीज का रहा था उस पूरी सीरीज की सबसे बड़ी उपलब्धि रही कि टीम नें एक वनडे मैच में जीत हासिल की ।

कहा जाता है कि उसके बाद हीं टीम इंडिया में यह विश्वास जगा कि वे वेस्टइंडीज को हरा सकते हैं । 1983 वर्ल्ड कप में,जब जब टीम इंडिया संकट में थी, कपिल देव नें न केवल खुद मोर्चा संभाला बल्कि टीम को विश्व विजेता बनाया जिसकी कल्पना किसी क्रिकेट पंडित नें नहीं की थी । जिंबाब्वे के खिलाफ जब टीम 17-5 थी,तब कपिल नें 175 रनों की ऐतिहासिक पारी खेली थी । फाइनल में वेस्टइंडीज को हरानें में कपिल नें तीन विकेट लिए वहीं विव रिचर्ड का जबर्दस्त कैच लपका। साल के अंत में वेस्टइंडीज से टेस्ट में 3-0,वनडे में 5-0 की हार मिली। साल 1984 के शुरूआत में कपिल की जगह गावस्कर को कप्तानी सौंप दी गई।

मार्च 1985 में कपिल एक बार फिर कप्तान बनाए गए जिसके बाद 1986 में टीम को इंग्लैंड में टेस्ट सीरीज जीत दिलाई। 1987 विश्वकप में भी कपिल देव हीं नेतृत्व कर रहे थे लेकिन उनका प्रदर्शन गिरता जा रहा था । यहाँतक की सेमीफाइनल में इंग्लैंड के हाथों हार के लिए उन्हें हीं दोषी ठहराया गया । इसके बाद उन्होंने कभी कप्तानी नहीं की। कप्तानी के दौरान कई बार उनके गावस्कर के साथ मतभेद की खबरें भी आई लेकिन दोनों नें इसे झूठ बताया ।

कपिलदेव नें टीम इंडिया को एक मुश्किल दौर में संभाला वहीं कप्तान रहते हुए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया । उन्होंने में 34 टेस्ट में टीम को लीड किया जिसमें सात हार,चार जीत और 22 मैच ड्रा रहे वहीं वनडे में 79 मैचों में 39 में जीत और 33 मैचों में हार मिली। टीम इंडिया को कमजोर माना जाता था लेकिन कपिल नें न केवल बड़ी टीम के खिलाफ जीत दिलाई बल्कि विपक्षी टीमों में भारत का खौफ भी पैदा किया ।

3. मोहम्मद अजहरुद्दीन- स्टाइलिश अजहरुद्दीन के क्रिकेट करियर को जिस रूप में याद रखा जाना चाहिए था,वैसा बिल्कुल भी नहीं हुआ । भारतीय क्रिकेट के महानतम कप्तानों में से एक अजहर नें 1989 में कृष्णामाचारी श्रीकांत से टीम इंडिया की बागडोर संभाली जिसके बाद उन्होंने साल 2000 तक 47 टेस्ट में टीम की कप्तानी की जिसमें रिकार्ड 14 टेस्ट में जीत दिलाई । बाद में उनके इस रिकार्ड को गांगुली नें तोड़ा । वनडे में भी अजहर की कप्तानी में टीम नें 174 मैचों में से 90में जीत दर्ज की।

यह भारत के किसी भी कप्तान का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था,जिसे 2014 में महेंद्र सिंह धोनी नें तोड़ा। साल 2000 में दक्षिण अफ्रीकी कप्तान हैंसी क्रोनिए नें अजहर पर यह आरोप लगाया कि उन्होनें उन्हें एक बुकी से संपर्क कराया था । मैच फिक्सिंग के इन 'गलत' आरोपों नें उनके क्रिकेट करियर पर एक गहरा काला धब्बा लगाया। बाद में आईसीसी और बीसीसीआई नें उनपर आजीवन प्रतिबंध लगाया। 2012 में अदालत के फैसलें में निर्दोष साबित होने के बाद उनपर से प्रतिबंध वापस ले लिया गया। अजहरुद्दीन आगे अपनी कप्तानी में और मुकाम हासिल कर सकते थें लेकिन अभी भी उनकी उपलब्धियाँ उन्हें महानतम कप्तान बनाती है।

4. सौरव गांगुली- सन 2000 में भारतीय क्रिकेट टीम के कई खिलाड़ी जब मैच फिक्सिंग के जाल में फंस चुके थे और उस समय के कप्तान सचिन तेंदुलकर ने खराब स्वास्थ्य कारणों से टीम की कप्तानी से इस्तीफा दे दिया तब सौरव गांगुली को टीम की कप्तानी सौंपी गई । ऐसे मुश्किल समय में सौरव गांगुली ने न केवल टीम का नेतृत्व किया बल्कि टीम को सजाया,संवारा.नए खिलाड़ियों को मौका दिया और टैलेंटेड खिलाड़ियों को टीम में जगह दिलाई ।

इन सबसे ऊपर टीम को फिर से जीत की पटरी पर वापस लाया । 2002 में सौरव गांगुली को काउंटी क्रिकेट में डरहम के लिए खराब खेल और नेटवेस्ट ट्रॉफी के फाइनल में इंग्लैंड के खिलाफ जीत के बाद टी-शर्ट उतारने के कारण काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा । लेकिन सौरव नें इसका असर टीम पर बिल्कुल भी नहीं होने दिया और साथ हीं भारतीय टीम को किसी नें आक्रमकता सिखाई,तो वह सौरव हीं थे ।

अबतक जब भी विदेशी खिलाड़ी खासकर ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के क्रिकेटर स्लेजिंग करते थे तो अक्सर टीम इंडिया के क्रिकेटर शांत हीं रहते थे लेकिन सौरव नें टीम को कहा अगर वे एक बोलते हैं तो तुम उन्हें चार सुनाओ । खुद उग्र स्वभाव के 'दादा' नें टीम में हर मैच को जीतनें की गजब भूख पैदा की और 2003 विश्वकप में टीम को फाइनल तक लेकर गए । यह कहना गलत नहीं होगा कि 21वीं सदी की टीम इंडिया जैसी भी है वह सौरव गांगुली के कप्तानी के बदौलत है ।

2000-05 तक सौरव गांगुली ने कुल 49 टेस्ट में कप्तानी की जिसमे 21 टेस्ट में जीत और 13 में हार मिली वहीं 15 मैच ड्रा रहे। वहीं वनडे में 1999-2005 के बीच 146 मैचों में कप्तानी की जिसमें 76 जीत एवं 65 हार मिली । चैपल विवाद और खराब फॉर्म के कारण जब सौरभ ने कप्तानी छोड़ी, वह एक ऐसी टीम तैयार कर चुके थे जिसे आने वाला कप्तान आसानी से आगे बढ़ा सकता था ।

5. महेंद्र सिंह धौनी- अगर बात रिकॉर्ड की, की जाए तो धोनी से बेहतर कप्तान कोई और नहीं है लेकिन यह भी सच है की धोनी को बेहतरीन खिलाड़ियों से भरी एक अच्छी टीम मिली थी । सितंबर 2007 में दक्षिण अफ्रीका में पहले ICC टी20 विश्व कप के लिए धोनी को टीम इंडिया की कमान दी गई और उन्होनें टीम इंडिया को चैंपियन बना़या । सितंबर 2007 में हीं माही को ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सात वनडे की सीरीज के लिए कप्तानी सौंपी गई तो 2008 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ चौथे टेस्ट से धोनी नें विधिवत रूप से टीम इंडिया की कमान अपनें हाथों में ली । इसके साथ हीं वह तीनों फार्मेट में टीम इंडिया के कप्तान बन गए ।

दिसंबर 2009 में उन्हीं के कप्तानी में भारत पहली बार आईसीसी टेस्ट रैंकिंग में नंबर वन बना । अगले साल जनवरी में दक्षिण अफ्रीका में 1-1 से टेस्ट सीरीज बराबर खेला । 2011 में माही के कप्तानी नें टीम इंडिया नें 28 साल बाद वनडे विश्वकप जीत लिया। सचिन तेंडुलकर ने कहा था कि जिन कप्तानों के अंदर मैंने खेला है,धोनी सर्वश्रेष्ठ हैं। मार्च 2013 में जैसे हीं धोनी नें गांगुली का सबसे ज्यादा टेस्ट जीत का रिकॉर्ड तोड़ा, सौरव नें एक इंटरव्यू में उन्हें सर्वकालिक महानतम कप्तान घोषित किया । इसी साल जून में इंग्लिश सरजमीं पर चैंपियंस ट्रॉफी की चैंपियन जीत और ऑस्ट्रेलिया का 4-0 से टेस्ट सीरीज में सफाया धोनी की प्रमुख उपलब्धि रही ।

किस्मत के धनी धोनी,2014 में टेस्ट कप्तानी छोड़ने से पहले भारत के सबसे सफलतम कप्तान बन चुके थे । 2016 में धोनी ने वनडे और टी-20 की कप्तानी भी छोड़ दी । 2008-14 तक धोनी नें 60 टेस्ट में कप्तानी की जिसमें 27 में जीत,18 में हार मिली वहीं 15 टेस्ट ड्रा पर खत्म हुए। वहीं वनडे में 2007-16 तक माही के नेतृत्व में टीम नें 199 मैचों में 110 जीत दर्ज की । 74 मैच हारें और चार मैच टाई पर समाप्त हुए । टी20 में कैप्टन कूल नें 72 मैचों में 41 जीत दिलाई वहीं 28 हार मिली। आज भी टीम की कप्तानी कोहली या रोहित कोई भी करे लेकिन सभी काम धोनी के दिशानिर्देश और सलाह के हीं होता है। इस बात में कोई शक नहीं की धोनी देश के हीं नहीं विश्व के महानतम कप्तान हैं ।

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