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अंडर-19 विश्वकप: देख लिया न दुनिया वालों, हम भारतीय चैंपियन हैं

तारीख 3 फरवरी,दिन शनिवार, सुबह के साढ़े 6 बजते हीं लाखों-करोड़ों क्रिकेटप्रेमी अपनें अपनें टीवी या मोबाइल सेट्स से चिपक गए थें। 19 साल या उससे कम उम्र की टीम इंडिया के लिए यह एक अभूतपूर्व दिन होनेंवाला था। टीम के किसी भी खिलाड़ी को बीते रात शायद हीं नींद आयी होगी। आखिर उनके कंधों पर पूरे देश के उम्मीदों का तगड़ा भार जो था। लेकिन इन सबके बावजूद आज क्रिकेट की दुनिया में भारत के इन जूनियर क्रिकेटरों नें चौथी बार अंडर-19 विश्वकप जीतकर अपनें देश का नाम सबसे ऊपर अंकित करा दिया है।

भारत में दोपहर के तकरीबन एक बजे थे जब भविष्य के सितारों से सजी टीम इंडिया की अंडर-19 ब्रिगेड,न्यूजीलैंड की धरती पर उसी के पड़ोसी ऑस्ट्रेलिया को करारी मात देकर विश्व चैंपियन बनी । यूँ तो कंगारू बड़े लड़ाके होते हैं,लेकिन इस टूर्नामेंट में दो बार उसे हराकर टीम इंडिया नें एकल बादशाहत साबित कर दी। इसमें भी दिलचस्प बात यह है कि उस देश में क्रिकेट हो रहा था,जहाँ ऑस्ट्रेलिया के सिम कार्ड पर रोमिंग भी नहीं लगती, यानि पूरा घरेलू कंडिशन। पूरे टूर्नामेंट में भारत के जीतनें का अंतर बयां कर देता है कि इस टीम को हरानें की हिम्मत किसी में नहीं।

भारत नें पहले ऑस्ट्रेलिया को 100 रन से,फिर पापुआ न्यूगिनी और जिंबाब्वे को दस दस विकेट से,क्वार्टर फाइनल में बांग्लादेश को 131, सेमीफाइनल में पाकिस्तान को 209 रन से नेस्तनाबूद करनें के बाद फाइनल में एकबार फिर कंगारूओं को 8 विकेट से करारी मात दी। टीम इंडिया को विजेता बनानें मे सबसे महत्वपूर्ण भूमिका कोच राहुल द्रविड़ की रही। जितनें शांत या कूल राहुल अपनें क्रिकेट करियर में रहे ,ठीक वैसे हीं इस युवा टीम को ट्रेंड किया। किसी भी बाहरी फैक्टर को इन युवाओं के प्रदर्शन में बाधा बनकर नहीं आने दिया।

यहाँ तक की आईपीएल की नीलामी के दो दिन बाद सेमीफाइनल में पाकिस्तान से मैच था लेकिन ऐसा लगा हीं नहीं कि अच्छी कीमत मिलनें का जोश इन युवाओं के आपे से बाहर है। यह फाइनल मुकाबला दोनों देशों के दो धाकड़ पूर्व खिलाड़ियों का था जो स्वभाव से बिल्कुल उलट है। टीम इंडिया की कमान 'मिस्टर कूल' राहुल द्रविड़ के हाथों थी,वहीं ऑस्ट्रेलियाई अंडर-19 टीम को कोचिंग देनें का काम गर्ममिजाजी,तुनकमिजाजी ग्रेग चैपल के पास था। फाइनल में टॉस जीतकर बैटिंग करनें के बाद भी कंगारू टीम केवल 216 रनों पर पवेलियन के रास्ते पर निकल गई।

इसके लिए भारत की वो गेंदबाजी लाइनअप जिम्मेदार थी जिसनें विपक्षी को ढ़ेर कर दिया,जिसमें उन्हें फील्डरों का भी भरपूर साथ मिला। हार्विक देसाई की विकेटकीपिंग भी शानदार रही। ऑस्ट्रेलिया की हालत और खराब होती अगर जोनाथन मरलो नें 77 रन नहीं बनाए होते। भारत की ओर से कमलेश नागरकोटी,शिवा सिंह,ईशान पोरेल,और अनुकूल राय नें दो-दो जबकि शिवम मावी नें एक विकेट लिया। पूरी तरह से बैट्समैनों के ऐशगाह में 300 गेंदों यानि 50 ओवरों में 217 रनों का लक्ष्य कहीं से भी मुश्किल नहीं था।

कम स्कोर का बचाव कर रहे कंगारूओं नें स्लेजिंग की शुरूआत जल्द हीं कर दी। जोनाथन मरलो और कई खिलाड़ी टीम इंडिया के ओपनर पृथ्वी शा और मनजोत कालरा पर लगातार टिका-टिप्पणी कर रहे थें। लेकिन वे भूल गए थे कि इन भारतीय युवाओं के गुरू 'मिस्टर कूल' द्रविड़ हैं। यहीं स्पष्ट हो गया कि एक तरफ राहुल द्रविड़ के लड़के हैं,जो हर बोली का जवाब बल्ले से देंगे,वहीं दूसरी तरफ चिर-परिचित ग्रेग चैपल के एग्रेसिव लौंडे जिन्हें तो खेलनें से ज्यादा स्लेजिंग से जीतनें पर विश्वास है। पृथ्वी शा नें लगातार कवर ड्राइव और आन ड्राइव मारकर,जबकि मंजोत कालरा नें छक्का जड़कर स्लेजिंग का मुँहतोड़ जवाब दिया। जैसे जैसे मैच बढ़ता गया,कंगारूओं की बोलती बंद होती चली गई...बस बोल रहा था तो टीम इंडिया के बल्लेबाजों का बल्ला।

पृथ्वी के 29 रन के निजी स्कोर पर बोल्ड होनें के बाद भी कालरा नें अपना बल्ला खामोश नहीं किया। शुभमन गिल 31 बनाकर जब आउट हुए तो टीम इंडिया का स्कोर 22वें ओवर में 131 रन था। फिर विकेटकीपर हार्विक देसाई नें ज्वाइन की मंजोत कालरा की कंपनी। मंजोत नें शानदार शतक जड़ा और अंत तक 101 रन बनाकर नाबाद रहे। इस प्रेशर वाले मैच में मंजोत की जो बैटिंग हुई,वह इंडियन क्रिकेट के भविष्य के लिए एक शुभ संकेत है। वहीं हार्विक देसाई नें भी नाबाद 47 रनों की पारी खेलकर अपना महत्व बता दिया।

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जैसे हीं हार्विक नें सदरलैंड की गेंद को स्क्वायर ड्राइव के द्वारा प्वाइंट बाउंड्री के बाहर भेजा,पूरा भारत झूम उठा। यह वह टीम है जो अगला कोहली,अगला भुवी और अगला जडेजा देगी। यह टीम एक हीं टाइटल की हकदार थी,वह है वर्ल्डकप...जो अब उसके कब्जे में हैं। शुभमन गिल को पूरे टूर्नामेंट में गजब की बैटिंग के लिए 'प्लेयर ऑफ द सीरिज' मिला वहीं कालरा को फाइनल का 'मैन ऑफ द मैच'। 'घर भी तुम्हारा,पिच भी तुम्हारी,दर्शक भी तुम्हारे लेकिन जीतेंगे तो हम हीं' ये घर के शेर नहीं हैं,ये हर जगह लड़ना जानते हैं।

इस टीम नें दिखाया कि उसमें जीतनें का जोश भी है,जज्बा और यकीन भी। इस टीम के कई ऐसे खिलाड़ी हैं,जो अगर इसी तरह खेलते रहे तो वे एकदिन सीनियर विश्वकप की ट्रॉफी भी उठायेंगे। कोच राहुल द्रविड़, फिल्डिंग कोच अभय शर्मा और  गेंदबाजी कोच पारस महाम्ब्रे के साथ पूरे सपोर्टिंग स्टाफ की भी तारीफ करनी होगी जिन्होनें न्यूजीलैंड में जाकर टीम को विश्व-विजेता बनाया। बीसीसीआई नें मुख्य कोच द्रविड़ को 50 लाख, खिलाड़ियों को 20-20 लाख एवं अन्य सपोर्ट स्टाफ को भी 20-20 लाख ईनाम देनें की घोषणा की है। आज पूरा भारत अपनें युवाओं के इस शानदार प्रदर्शन पर गौरवान्वित है। जय हो....चक दे इंडिया..जय हिंद जय भारत

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