इतिहास के पन्नों से खेल

जब कप्तान बेदी नें गुस्से में पाकिस्तान को दे दी जीत

ज से ठीक 39 साल पहले भारत और पाकिस्तान के बीच तीन मैचों की सीरिज का अंतिम मैच खेला जाना था। मोहिंदर अमरनाथ के बेहतरीन आलराउंड खेल के दम पर भारत क्वेटा में पहला वनडे जीत चुका था,वहीं सियालकोट के वनडे में इमरान खान के न होते हुए भी पाकिस्तान को जीत मिली थी। सीरिज 1-1 से बराबरी पर था और सभी निगाहें तीन नवंबर को साहिवाल के जफर अली स्टेडियम में होनें वाले मैच पर टिकी थी।

पाकिस्तान के कप्तान मुश्ताक मोहम्मद नें एकदम बेजान दिख रहे पिच पर पहले बैटिंग करनें का फैसला किया,तब लगा शायद पाक के पास एडवांटेज हो गया है। माजिद खान और अजमत राना की ओपनिंग जोड़ी नें मेजबान टीम को अच्छी और सधी शुरूआत दी। भारतीय गेंदबाजों नें मीडिल ओवरों में गजब की गेंदबाजी की और रनगति एकदम ठहर सी गई।

लेकिन वह आसिफ इकबाल हीं थे जिन्होंने 72 गेंदों पर 62 रनों की तेज पारी खेलकर पाकिस्तान को सम्मानजनक स्कोर तक पहुँचनें का मौका दिया। करसन घावरी, एस वेंकटराघवन और मोहिंदर अमरनाथ नें बेहतरीन बालिंग कर मेजबान को बड़ा स्कोर नहीं बनानें दिया। पाकिस्तान का अंतिम स्कोर रहा 40 ओवर में सात विकेट पर 205 रन। टेस्ट सीरीज में लगभग 90 की औसत से 447 रन बनानें वाले टीम इंडिया के चिरपरिचित ओपनर सुनील गावस्कर खेल नहीं रहे थे। अब पूरी जिम्मेदारी चेतन चौहान और अंशुमन गायकवाड़ की सलामी जोड़ी पर थी।

दोनों नें इंडिया को अच्छी शुरुआत दी और जब ऐसा लगा कि आज ये दोनों कुछ बड़ा करनें को तैयार है, 44 रन के टीम स्कोर पर चेतन 23 रन बनाकर पवेलियन लौट गए। गायकवाड़ का साथ देनें आए सुरिंदर अमरनाथ। पाक कप्तान मुश्ताक मोहम्मद नें अपनें पेस बैट्री के हरेक फेज का इस्तेमाल किया लेकिन इन दोनों के सामने सबका करेंट खत्म हो गया। जब टीम इंडिया जीत से 43 रन दूर थी,सुरिंदर आसिफ इकबाल को अपना विकेट दे बैठे। तब क्रीज पर आगमन हुआ उस समय टेस्ट क्रिकेट के बेहतरीन बल्लेबाज गुंडप्पा विश्वनाथ का।

उन्होंने अंशुमन का साथ देकर यह सुनिश्चित किया कि भारत को और झटके ना लगनें पाये। टीम इंडिया का स्कोर था 183-2,37 ओवर की समाप्त पर। अंतिम तीन ओवरों में जीत के लिए 23रन चाहिए थे। सरफराज के दो और इमरान का एक ओवर आना तय था। बाकी गेंदबाज अपनें कोटे का आठ ओवर डाल चुके थे। इस समय भारत जीत के लिए फेवरेट था क्योंकि मोहिंदर अमरनाथ,यशपाल शर्मा और कपिल देव बैटिंग के लिए आनेवाले थें।

सरफराज के हाथ में गेंद थी,और सामनें 78 रन पर खेल रहे अंशुमन गायकवाड़। पहली गेंद,बैट्समैन के सिर के काफी ऊपर से विकेटकीपर वसीम बारी के ग्लव्स में, सबको लगा पहला बाउंसर हो सकता है। दूसरी गेंद, एकबार फिर बाउंस करती हुई काफी ऊपर से बारी के दस्तानों में आराम करती हुई..इसबार भी अंपायर नें वाइड नहीं दिया। तीसरी गेंद, फिर वही लाइन, सर के ऊपर से बाउंस करती हुई कीपर के पास. जिन गेंदों पर लंबे कद के अंशुमन नहीं पहुँच पा रहे थे,उसे अंपायर लगातार लीगल गेंद घोषित कर रहे थे। इस समय न्यूट्रल अंपायर का प्रचलन नहीं था, जहाँ मैंच होता था,वहीं के अंपायर होते थे।

जिस समय पाकिस्तानी अंपायर पक्षपातपूर्ण डिसीजन दे रहे थे, भारतीय कप्तान बिशन सिंह बेदी ऐसा कुछ करनें की सोंच रहे थें जो इतिहास में सिर्फ़ उन्होनें हीं किया था। चौथी गेंद, सरफराज की वही टैक्टिस, ऐसी गेंद जिसतक बैट्समैन पहुँच ना सके..बाकी मैनेज करनें के लिए अंपायर तो थें हीं। चार लगातार ऐसी गेंद,जिसपर बैट्समैन चेयर लगाकर भी ना पहुँच सकें. भारतीय कप्तान बिशन सिंह बेदी नें सबसे बोल्ड निर्णय लेते हुए अपनें दोनों बैट्समैन को बुला लिया और पाक टीम को जीत दे दी। उस समय ऐसा करना बिल्कुल नया था,लेकिन बेदी नें ऐसा किया।

भले हीं भारत 1-2 से सीरिज हार गया लेकिन इस घटना नें न्यूट्रल अंपायर रखनें की परंपरा को जन्म दिया। साहिवाल इसके बाद कभी इंटरनेशनल मैचों की मेजबानी नहीं कर पाया। बेदी नें इससे पहले 1975-76 में किंग्सटन ओवल में क्लाइव लायड की घातक फास्ट बालिंग प्लान को खत्म करते हुए पहले हीं पारी डिक्लेयर कर दिया था। बेदी का इसतरह वनडे मैच में विपक्षी टीम को जीत देना उस समय का पहला मामला था जिसे 22 साल बाद इंग्लैंड के कप्तान एलेक स्टेवर्ट नें किया। उन्होनें पाकिस्तान को तब जीत दे दी जब उसे 64 गेंद में चार बनानें थे और कुछ दर्शक पिच पर हिंसा करनें लगे। भारत और पाकिस्तान का यह विवादित वनडे इतिहास में हमेशा पाकिस्तानी अंपायरों के गंदे डिसीजन और पाक खिलाड़ियों के निगेटिव खेल की वजह से याद रखा जाता है।

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